विवाद के बीच केंद्र का स्पष्ट रुख— न नई माइनिंग लीज, न संरक्षण में कटौती
नई दिल्ली।
अरावली पर्वतमाला को लेकर हाल के दिनों में फैले भ्रम पर केंद्र सरकार ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने दो टूक कहा है कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की नई माइनिंग लीज नहीं दी जाएगी और मौजूदा संरक्षण कानूनों में कोई ढील नहीं दी जा रही है। इसके उलट, सरकार ने अरावली के संरक्षित क्षेत्र का दायरा और बढ़ाने का निर्णय लिया है।
विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के बाद हुई, जिसमें अरावली पर्वतमाला की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय करने की बात कही गई थी। अदालत का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों में चली आ रही परिभाषागत भिन्नताओं को समाप्त कर संरक्षण कानूनों को अधिक प्रभावी बनाना था। हालांकि, इस तकनीकी आदेश को कुछ हलकों में खनन से जोड़कर पेश किया गया, जिससे भ्रम की स्थिति बनी।
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहीं भी खनन की अनुमति नहीं दी और न ही किसी प्रतिबंध को हटाने का आदेश दिया है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, अरावली भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा की रीढ़ है, जो भूजल रिचार्ज, जैव विविधता और जलवायु संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी कारण संरक्षण को कमजोर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
सरकार ने यह भी साफ किया कि “0.19 प्रतिशत क्षेत्र” को लेकर जो बातें फैलाई जा रही हैं, वे केवल एक तकनीकी अध्ययन का हिस्सा हैं। इसका अर्थ खनन की अनुमति नहीं है। मंत्रालय ने दोहराया कि जब तक कोई वैज्ञानिक और सख्त प्रबंधन योजना तैयार नहीं होती, तब तक एक भी नई माइनिंग लीज जारी नहीं की जाएगी।
केंद्र ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर सख्त निगरानी रखी जाए और संरक्षण कानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। सरकार का कहना है कि आने वाले समय में अरावली के और हिस्सों को नो-माइनिंग ज़ोन घोषित किया जाएगा।
स्पष्ट है कि अरावली को लेकर फैला डर निराधार है। केंद्र और न्यायपालिका दोनों का संदेश एक है—खनन नहीं, संरक्षण ही प्राथमिकता है।
