नई दिल्ली। संसद के उच्च सदन में उस समय हलचल मच गई जब आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए “राइट टू रिकॉल” लागू करने की जोरदार मांग उठाई। सदन में कई सदस्यों के बीच असहमति की फुसफुसाहट के बीच चड्ढा ने साफ कहा कि मतदाताओं को अपने सांसदों और विधायकों को एक तय अवधि के कार्यकाल के बाद वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए, यदि वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते।
चड्ढा ने दलील दी कि दुनिया के 24 देशों में यह व्यवस्था किसी न किसी रूप में मौजूद है और भारत में भी कर्नाटक व राजस्थान सहित कुछ राज्यों में पंचायत स्तर पर लागू है। उन्होंने इसे मतदाताओं के लिए “बीमा तंत्र” बताते हुए कहा कि यह अधिकार जनता को अपने जनादेश की रक्षा करने और नाकाम जनप्रतिनिधियों से उसे वापस लेने की ताकत देगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और अन्य संवैधानिक पद महाभियोग की प्रक्रिया के दायरे में आते हैं, तो आम नागरिकों को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए।
साथ ही चड्ढा ने सुझाव दिया कि यदि यह अधिकार लागू किया जाए तो इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान हों। उनके अनुसार, तभी रिकॉल की प्रक्रिया सफल मानी जाए जब संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से कम से कम 50 प्रतिशत मतदाता प्रतिनिधि को वापस बुलाने के पक्ष में मतदान करें।
संसद में उठी यह मांग देशभर में लोकतंत्र, जवाबदेही और जनशक्ति को लेकर नई बहस देश भर में छिड़ चुकी है।

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