🌸 रंगों से बड़ी इंसानियत — होली की एक सच्ची सीख देने वाली कहानी फाल्गुन का महीना था। गांव की गलियों में ढोलक की थाप गूंज रही थी, बच्चे रंग और पिचकारी की तैयारी में लगे थे। हर घर में गुझिया और मालपुए की खुशबू फैल रही थी। पूरा गांव होली के उत्साह में डूबा था… लेकिन उसी गांव के किनारे एक छोटा-सा घर ऐसा भी था, जहां इस बार रंग नहीं, सन्नाटा था। उस घर में रहते थे रामू काका — गांव के सबसे पुराने कुम्हार। उम्र ढल चुकी थी, हाथ कांपते थे, और पिछले साल बेटे के शहर चले जाने के बाद वे बिल्कुल अकेले हो गए थे। कभी जिनके बनाए मिट्टी के घड़े हर घर की शान होते थे, आज वही काका लोगों की यादों से भी मिटते जा रहे थे। होली की सुबह गांव के बच्चे रंग खेलने निकले। तभी 10 साल की छोटी गौरी ने देखा कि रामू काका के आंगन में ना रंग है, ना कोई आने वाला। उसने मासूमियत से पूछा — “काका, आप होली नहीं खेलेंगे?” रामू काका मुस्कुराए, लेकिन आंखों की नमी छुपा नहीं पाए — “बेटी, जिनके अपने दूर हो जाएं, उनकी होली भी फीकी हो जाती है…” गौरी चुपचाप वापस गई। कुछ देर बाद पूरा मोहल्ला रामू काका के घर के बाहर था। कोई रंग लेकर आया, कोई मिठाई, कोई ढोलक। देखते ही देखते सूना आंगन हंसी और रंगों से भर गया। गांव के सरपंच ने काका के माथे पर गुलाल लगाते हुए कहा — “होली सिर्फ अपने लोगों के साथ नहीं, अपनों को बनाने का त्योहार है।” उस दिन पहली बार गांव ने समझा — होली रंगों से नहीं, रिश्तों से खेली जाती है। रामू काका रो पड़े… लेकिन ये आंसू अकेलेपन के नहीं, अपनापन मिलने के थे। 🌼 कहानी की सीख आज समाज में लोग त्योहार तो मनाते हैं, लेकिन आसपास के अकेले बुजुर्ग, जरूरतमंद और दुखी लोगों को भूल जाते हैं। अगर इस होली हम किसी एक उदास चेहरे पर मुस्कान ला दें — वही सच्ची होली होगी। रंग चेहरे पर नहीं, दिलों पर लगाइए… क्योंकि सबसे सुंदर रंग इंसानियत का होता है। – देवप्रीत