अजमेर । प्रधानमंत्री की 28 फरवरी की सभा को लेकर भाजपा संगठन महीनों से तैयारी में जुटा था। दावा किया गया ऐतिहासिक भीड़ आएगी, जनसैलाब उमड़ेगा, अजमेर फिर कमलमय होगा।
लेकिन सभा समाप्त होने के बाद शहर की गलियों, चौराहों और राजनीतिक गलियारों में जो चर्चा रही, वह मंच के भाषणों से कहीं ज्यादा तीखी थी।
कहने को यह प्रधानमंत्री की सभा थी, पर असली परीक्षा अजमेर भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की थी — और यहीं तस्वीर भीड़ ने धुंधली कर दी।
सभा स्थल तक पहुंचने वाले लोगों से लेकर कार्यक्रम के बाद लौटती भीड़ तक एक सवाल बार-बार सुनाई दिया — “अजमेर खुद क्यों नहीं उमड़ा?”
स्थानीय व्यापारियों, युवाओं और वार्ड स्तर के कार्यकर्ताओं का मानना रहा कि इस बार शहर की स्वाभाविक भागीदारी पहले जैसी नहीं दिखी। प्रशासनिक इंतजाम बड़े थे, झंडे भी लहराए, लेकिन बड़ी संख्या में लोग आसपास जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों से लाए गए।
सभा समाप्त होते ही कुछ स्थानों पर लोग मंच क्षेत्र से बैनर-पोस्टर समेटते नजर आए। वह दृश्य अपने आप में विकास की कहानी चीख चीख कर सुना रहा था ।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसे सरकार की नीतियों का जमीनी स्तर पर हकीकत बताने वाला दृश्य बताया, जो आने वाले समय की शुरुआत है ।
अजमेर भाजपा — गुटों में बंटी ताकत
अजमेर भाजपा लंबे समय से आंतरिक खींचतान से जूझती रही है।
पूर्व पदाधिकारी बनाम वर्तमान नेतृत्व, विधायक समूह बनाम संगठन, और पार्षद स्तर की प्रतिस्पर्धा ने पार्टी की जमीनी ऊर्जा को कमजोर किया है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि:
नगर निगम में भ्रष्टाचार के आरोपों पर नेतृत्व मौन रहा,
पार्षदों के कामकाज को लेकर जनता की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई,विकास से ज्यादा पद और प्रभुत्व की राजनीति हावी रही।
परिणाम यह हुआ कि शहर की मध्यमवर्गीय और व्यापारी आबादी, जो कभी भाजपा की मजबूत रीढ़ मानी जाती थी, धीरे-धीरे दूरी बनाती दिखाई दी।
भ्रष्टाचार पर चुप्पी — सबसे बड़ा कटाक्ष
अजमेर नगर निगम, निर्माण कार्यों, सड़क और सफाई,स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार, पार्षदों के सार्वजनिक अतिक्रमण,शिलान्यास,उदघाटन आदि व्यवस्थाओं को लेकर लगातार उठते सवालों पर स्थानीय नेताओं की चुप्पी अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुकी है।
जनता पूछ रही है —
“जब अपने शहर के भ्रष्टाचार पर आवाज नहीं उठी, तो बड़े मंच के भाषण मुंगेरीलाल के सपने जैसे ही साबित होंगे ?”
मोदी बनाम स्थानीय चेहरों का अंतर
एक समय था जब मोदी नाम भर से भीड़ स्वतः उमड़ती थी।
इस बार दृश्य अलग रहा —
मंच पर राष्ट्रीय नेतृत्व का करिश्मा था, लेकिन जमीन पर स्थानीय नेतृत्व की थकान मौजूदा भीड़ ने दिखा दी ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:
“अजमेर में स्थानीय नेताओं के फीके जलवों ने मोदी के राष्ट्रीय आकर्षण को भी सीमित कर दिया।” वहीं मोदी के सपने” स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट ” के भ्रष्टाचार ने अजमेर को राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार की ख्याति दिलाई। जिससे मोदी के जलवों को पंख लगाने की बजाए उन्हें कुतर दिए गए ।
भीड़ कम — जिम्मेदारी किसकी?
सभा के बाद संघ/संगठन के भीतर यह चर्चा तेज हुई कि अपेक्षित भीड़ न जुट पाने का कारण क्या रहा ?
नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा,गुटबाजी,टिकट और पद की राजनीति और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा रहा।
वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऊपर तक ताकत दिखाने की होड़ में नीचे का संगठन कमजोर हो गया। अब चापलूस और सोशल मीडिया चलाने वाले नेताओं का संगठन रह गया । जमीनी कार्यकर्ता को सिर्फ भीड़ जुटाने के लिए काम में किया जाता है ।
लहर नहीं, लक्षण दिखे
अजमेर की इस सभा ने एक संकेत जरूर दिया। राजनीतिक लहरें केवल बड़े चेहरों से नहीं चलतीं, उन्हें स्थानीय नेतृत्व का भरोसा आगे बढ़ाता है।
यदि शहर की समस्याएं —
महंगाई, बेरोजगारी, स्थानीय भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता —
अनसुनी रहीं, तो वही जनता, जो कभी तालियां बजाती थी, आने वाले समय में सवाल भी पूछ सकती है।
कहा जा सकता है कि इस बार अजमेर में लहर कम और नेतृत्व को लेकर अंदरूनी हलचल ज्यादा दिखाई दे रही हैं ।
अगर यही स्थिति रही तो राजनीतिक हवा बदलने में देर नहीं लगेगी। क्योंकि इतिहास गवाह है, जब जनता खामोश होती है तो सत्ता नसीनों पर उसका कहर अचानक टूटता है।
अजमेर की सभा खत्म हो गई… लेकिन सवाल अभी मंच से नीचे खड़े हैं, भीड़ कम क्यों,स्थानीय लोगों की दूरी….?

जब सघंठन स्वंय ही यह कह कर तैयारी करे की भीड़ जुटानी है यानी मोदी की बात नहीं सुननी,सिर्फ भीड़ दिखानी है,जब कुर्सियां ही तीस पैतींस हजार भरनी है तो काहे लाखों का ऐलान करना?यदि चालीस हजार का ही लक्ष रखे तो संभाग में इतने तो पंजीकृत कार्यकर्ता ही है,सिर्फ उनको ही ठीक से कहे तो दिक्कत नहीं,लेकिन बजट लाखों का आना है,उसको भी तो ठिकाने लगाना है,इस बजट ने सारी रैलियों पर पानी फेर दिया,आगे भी यही होगा,