अजमेर: देश में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून जरूरी है। इस बुनियादी सच से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन सवाल यह है कि जब कानून बनाए जाते हैं, तो क्या वे न्याय के लिए होते हैं या डर पैदा करने के लिए? अजमेर से राष्ट्रपति के नाम भेजा गया एक ज्ञापन इसी असहज सवाल को सामने लाता है।
“सामान्य वर्ग, अजमेर” द्वारा उठाया गया मुद्दा सीधा है—यदि कानून का तराजू पहले दिन से ही एक तरफ झुका होगा, तो न्याय सिर्फ कागज़ पर रह जाएगा। आज देश में भारतीय न्याय संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और SC/ST एक्ट जैसे कड़े प्रावधान पहले से मौजूद हैं। फिर नए एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियमों में ऐसा क्या है, जो पुराने कानून नहीं कर पा रहे?
सबसे बड़ा और सबसे असहज सवाल—झूठे आरोपों का।
2012 में नियम था कि यदि शिकायत गलत पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता पर जुर्माना लगेगा। यह प्रावधान इसलिए था ताकि कानून डर का नहीं, न्याय का औजार बने। नए नियमों में यह सुरक्षा कवच हटा दिया गया है। आखिर क्यों? क्या यह मान लिया गया है कि अब कोई झूठ नहीं बोलेगा?
नए नियमों में OBC वर्ग को भी पीड़ित श्रेणी में शामिल किया गया है। समस्या इसमें नहीं है। समस्या यह है कि कहीं इसका व्यावहारिक अर्थ यह न निकल जाए कि सामान्य वर्ग स्वतः आरोपी है। संविधान दोष सिद्ध होने से पहले किसी को अपराधी नहीं मानता—तो कानून ऐसा संकेत क्यों दे?
ज्ञापन में साफ कहा गया है कि यदि कोई सवर्ण व्यक्ति जातिगत भेदभाव करता है, तो उस पर सख्त कार्रवाई हो। इस मांग से कोई असहमत नहीं हो सकता। लेकिन न्याय का दूसरा पलड़ा भी उतना ही जरूरी है—यदि कोई निर्दोष फँसाया जाए, तो दोषी कौन?
यह बहस भावनाओं की नहीं, अधिकारों की है। कानून अगर डर पैदा करेगा, तो समाज खामोश होगा—और खामोशी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जांच समितियों में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता कोई अतिरिक्त मांग नहीं, बल्कि न्यूनतम न्याय है।
यह कॉलम किसी वर्ग के खिलाफ नहीं है। यह उस सामान्य नागरिक के लिए है, जो यह सोचकर चुप बैठा है कि “हमारा क्या बिगड़ेगा।” इतिहास गवाह है—जब कानून पर सवाल पूछने का समय निकल जाता है, तब सिर्फ सफाई देने का मौका बचता है।
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अब सवाल यह नहीं है कि कानून बने या नहीं। सवाल यह है—क्या कानून सबके लिए समान होगा?
अगर जवाब ‘हाँ’ है, तो उसे शब्दों में नहीं, प्रावधानों में दिखना चाहिए।

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