दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उस याचिका को सोमवार, 19 जनवरी 2026 को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने उन्नाव रेप पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत के मामले में सजा निलंबन (बेल/सजा पर रोक) की मांग की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई ठोस आधार नहीं है जिससे उन्हें राहत दी जा सके।
न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा ने यह भी कहा कि सेंगर अपनी कुल 10-साल की सजा में से करीब 7.5 साल हिरासत में बिता चुके हैं, लेकिन उनकी अपील पर फैसला लंबित रहने का कोई ठोस कारण अदालत के सामने नहीं है । कई याचिकाओं के कारण अपील सुनवाई में देरी हुई है, जिसका फायदा सेंगर को नहीं मिल सकता।
इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि सेंगर को फिलहाल जेल में ही रहना होगा और उन्हें इस मामले से जुड़े दंड से कोई राहत नहीं मिलेगी। सीबीआई ने भी प्रारंभ से ही उनकी रिहाई का कड़ा विरोध किया था, जिसे अदालत ने भी गंभीरता से लिया।
यह मामला 2018 में उस समय ध्यान में आया था जब पीड़िता के पिता को सेंगर के निर्देश पर पुलिस ने गिरफ्तार किया था और पुलिस हिरासत में बर्बरता के चलते उनकी मृत्यु हो गई थी। इस घटना के लिए मार्च 2020 में दिल्ली की एक अदालत ने सेंगर और अन्य को दोषी करार देते हुए 10 साल की सजा सुनाई।
सेंगर पहले उन्नाव रेप मामले (जहाँ पीड़िता एक नाबालिग थीं) के लिए आजन्म कारावास की सजा पा चुके हैं और उनके खिलाफ अपील भी लंबित है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पहले उनके बेल के आदेश को भी रोका था।
न्यायालय का यह कड़ा रुख उन मामलों में उदाहरण है। जहाँ गंभीर अपराध और नाजुक संवेदनशील तथ्य जुड़े हों, और ऐसे मामलों में न्यायपालिका ने बार-बार कहा है कि जनता के विश्वास को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
