बहू प्रीति चौधरी ने पेश की श्रद्धा, संस्कार और समर्पण की अनुपम मिसाल

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मां की सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ!

02 जून 2026 | नई दिल्ली/मथुरा

आज के दौर में जहां आधुनिकता की दौड़ में रिश्तों की गर्माहट और बड़ों के प्रति सम्मान धीरे-धीरे कम होता दिखाई देता है, वहीं उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के कोसी कलां की रहने वाली प्रीति चौधरी ने भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सेवा भाव की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने लाखों लोगों के हृदय को भावुक कर दिया है।

85 वर्षीय अपनी वृद्ध सास चंद्रो देवी की वर्षों पुरानी धार्मिक इच्छा को पूरा करने के लिए प्रीति चौधरी उन्हें टब में बैठाकर पवित्र ब्रज 84 कोस परिक्रमा करा रही हैं। यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि एक बहू द्वारा अपनी मां समान सास के प्रति अटूट प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का जीवंत उदाहरण है।

वृद्धावस्था के कारण चंद्रो देवी स्वयं चलकर परिक्रमा करने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन उनकी आस्था कहीं कमजोर नहीं पड़ी। उनकी इसी आस्था को अपना संकल्प बनाकर प्रीति चौधरी ने उनके जीवन के इस पावन स्वप्न को साकार करने का बीड़ा उठाया। कई किलोमीटर लंबी, कठिन और तपस्या समान मानी जाने वाली इस परिक्रमा में जिस धैर्य, सेवा और त्याग की आवश्यकता होती है, उसे प्रीति चौधरी हर कदम पर निभा रही हैं।

जब लोग अपने माता-पिता और बुजुर्गों को बोझ समझने लगते हैं, तब प्रीति चौधरी का यह कार्य पूरे समाज के लिए एक आईना बनकर सामने आया है। उनकी सेवा देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई बेटी अपनी मां को तीर्थ यात्रा करा रही हो। यह दृश्य केवल आंखों को नहीं, बल्कि आत्मा को भी स्पर्श करता है।

भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” अर्थात माता-पिता ही धरती पर ईश्वर का स्वरूप हैं। प्रीति चौधरी ने इस वाक्य को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने कर्मों से साकार कर दिखाया है। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों और तीर्थों में नहीं, बल्कि अपने बुजुर्गों की सेवा में भी निहित होती है।

उनका यह समर्पण उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपने माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा को जीवन का सर्वोच्च धर्म मानते हैं। यह कहानी केवल एक बहू की नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों, पारिवारिक प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की कहानी है।

प्रीति चौधरी का यह कार्य आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि यदि घर में प्रेम, सम्मान और सेवा का भाव जीवित रहे, तो हर परिवार स्वयं एक तीर्थ बन सकता है। ऐसी पुत्रवधू वास्तव में समाज का गौरव हैं, जिनके कारण आज भी भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत और जीवंत हैं।

सच ही कहा गया है— “जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान होता है, वहां ईश्वर स्वयं निवास करते हैं।”

अखबार पढ़ें: http://bit.ly/4dJi2mp

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