हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले में स्थित भरमौर के चौरासी मंदिरों में से एक अद्वितीय चित्रगुप्त मंदिर, जहां धर्म और न्याय का संदेश हर पत्थर में अंकित है।
भरमौर (चंबा) विशेष रिपोर्ट
लेखक – देवेंद्र सक्सेना
हिमाचल प्रदेश की शांत, पवित्र और दिव्य वादियों में बसा भरमौर न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह भगवान शिव की तपोभूमि के रूप में भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। समुद्र तल से करीब 2195 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह नगर कभी प्राचीन चंबा राज्य की राजधानी रहा है।
भरमौर के मध्य में स्थित चौरासी मंदिर समूह अपनी स्थापत्य कला और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है। कहा जाता है कि यहाँ 84 सिद्धों ने तपस्या की थी, और उसी तपोभूमि पर आज भी 84 मंदिर खड़े हैं — हर एक मंदिर एक कथा, एक आस्था और एक संदेश देता है।
🔱 चित्रगुप्त मंदिर — कर्मों का लेखा रखने वाले देवता का धाम
इन 84 मंदिरों में सबसे अनोखा और दुर्लभ है चित्रगुप्त मंदिर, जो उन विरले स्थानों में से है जहाँ चित्रगुप्त जी की पूजा होती है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार, चित्रगुप्त देवता यमराज के सचिव हैं, जो प्रत्येक मनुष्य के कर्मों का लेखा रखते हैं और मृत्यु के पश्चात न्याय के समय वही कर्मपुस्तिका प्रस्तुत करते हैं।
भरमौर का यह चित्रगुप्त मंदिर नागर शैली की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित चित्रगुप्त जी की मूर्ति हाथ में लेखनी और पाटी लिए हुए है — जो यह प्रतीक है कि हर कर्म का लेखा स्वर्ग में कहीं न कहीं लिखा जा रहा है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भरमौर आने वाला हर तीर्थयात्री पहले चित्रगुप्त जी के दर्शन करता है, ताकि उसके आगामी शुभ कर्मों की लेखनी मंगलमय हो जाए।
भरमौर से लगभग 28 किलोमीटर दूर स्थित मनिमहेश झील और भगवान शिव का मनिमहेश मंदिर इस पवित्र भूमि की आस्था को और गहराई देता है।
श्रावण मास में यहाँ मनिमहेश यात्रा और चौरासी मंदिर मेला का आयोजन होता है। इस दौरान चित्रगुप्त मंदिर में विशेष “यम द्वितीया” पूजा संपन्न की जाती है, जब बहनें अपने भाइयों के दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं।
भरमौर का वातावरण केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभूति से भरा हुआ है। मंदिरों की शिल्पकला, पत्थरों पर उकेरे गए देव रूप और वातावरण में व्याप्त दिव्यता यह सिखाती है कि धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि कर्म और न्याय का जीवंत संतुलन है।
चित्रगुप्त मंदिर का संदेश है — “हर मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है।”
