ढाका । (एजेंसी) लगभग डेढ़ वर्ष पहले हुए राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बांग्लादेश में अब चुनावी प्रक्रिया एक बार फिर पटरी पर लौट रही है। शेख हसीना सरकार के तख्तापलट और अंतरिम शासन व्यवस्था के 18 महीने पूरे होने के बाद देश में फरवरी 2026 में प्रस्तावित आम चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। अंतरिम सरकार के प्रमुख एवं नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की निगरानी में चुनाव आयोग ने 11 दिसंबर 2025 को चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की।
इस बार चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि पहली बार सभी प्रमुख दल—बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP), जमात-ए-इस्लामी सहित कई क्षेत्रीय दल—चुनावी मैदान में उतरने जा रहे हैं। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग फिलहाल चुनावी प्रक्रिया में सीमित भूमिका में है, क्योंकि तख्तापलट के बाद से राजनीतिक अस्थिरता और कानूनी प्रतिबंधों का असर उस पर जारी है।
देश की आंतरिक राजनीति में इस बार अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय का मुद्दा भी चर्चा में है। लगभग 8 प्रतिशत जनसंख्या वाला यह समुदाय पारंपरिक रूप से कुछ महत्वपूर्ण संसदीय सीटों को प्रभावित करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिंदू मतदाता कुछ क्षेत्रों में परिणाम बदल सकते हैं, परंतु सोशल मीडिया पर फैल रहे दावों—कि “हिंदू तय करेंगे सरकार”—को विशेषज्ञ भ्रामक और अतिरंजित बताते हैं। उनका कहना है कि यह समुदाय चुनावी समीकरण का एक हिस्सा अवश्य है, पर निर्णायक शक्ति नहीं।
अंतरिम सरकार की कोशिश है कि चुनाव शांतिपूर्ण और पारदर्शी तरीके से संपन्न हों। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता को लेकर नजर बनाए हुए है क्योंकि देश पिछले 18 महीनों से संवैधानिक संक्रमण की स्थिति में है।
आगामी चुनाव यह तय करेंगे कि देश में लोकतांत्रिक ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ेगा और सत्ता किस राजनीतिक ध्रुव के पास जाएगी। सभी दलों की रणनीतियों और जनता के रुझान के बीच बांग्लादेश आने वाले महीनों में एक बड़े राजनीतिक मोड़ की ओर बढ़ रहा है।
