37 से 43 का खेल! सोफिया कुरैशी के पिता का बयान बना सबसे बड़ा सवाल, कांग्रेस के हाथ से कैसे फिसली मेयर की कुर्सी?

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अजमेर। अजमेर नगर निगम के मेयर चुनाव का परिणाम सामने है, लेकिन असली राजनीतिक कहानी अब शुरू हुई है। कांग्रेस के 37 पार्षद होने के बावजूद उसकी प्रत्याशी किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले, जबकि भाजपा की अनामिका शर्मा 43 वोट लेकर मेयर निर्वाचित हुईं। यानी भाजपा अपने 32 पार्षदों के मूल आंकड़े से 11 वोट आगे निकल गई। यही 11 वोट अब अजमेर की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल बन गए हैं।

चुनाव से पहले कांग्रेस के पास 37 पार्षद थे और 11 निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी माने जा रहे थे। राजनीतिक समीकरणों में निर्दलीयों को साधने की कोशिश दोनों तरफ से चल रही थी। लेकिन मतदान के दिन तस्वीर भाजपा के पक्ष में चली गई। उपलब्ध चुनावी रिपोर्टों में भी यही संख्या सामने आई है कि भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 और कांग्रेस की किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले।

अब इस पूरे घटनाक्रम में सोफिया कुरैशी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। सोफिया निर्दलीय पार्षद हैं और उनके पिता का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें उन्होंने डिप्टी मेयर पद की मांग का उल्लेख किया और यह कहा कि अभी तक कांग्रेस की ओर से उन्हें कोई लेटर जारी नहीं किया गया।

यहीं से कांग्रेस के लिए सवाल खड़ा होता है—क्या कांग्रेस सोफिया कुरैशी पक्ष की राजनीतिक अपेक्षा पूरी नहीं कर पाई?

स्थानीय कांग्रेसियों की ओर से यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि सोफिया कुरैशी के पिता अन्य पार्षदों के संपर्क में थे। यदि ऐसा था तो क्या कांग्रेस नेतृत्व को इसकी जानकारी थी? क्या बातचीत अंतिम समय तक चलती रही? और क्या इसी दौरान भाजपा ने अपना राजनीतिक समीकरण मजबूत कर लिया?

इन सवालों का कोई आधिकारिक उत्तर अभी सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना कि भाजपा ने सोफिया कुरैशी या अन्य पार्षदों को अपने साथ मिला लिया, फिलहाल प्रमाणित तथ्य नहीं है। लेकिन 43-37 का आंकड़ा इतना जरूर कहता है कि मतदान से पहले बने समीकरण और मतदान के समय की स्थिति में बड़ा अंतर था।

यही अंतर अब कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी पहेली है।

क्या यह कांग्रेस के भीतर भितरघात था?
क्या निर्दलीय पार्षदों ने अपनी राजनीतिक शर्तों के आधार पर आखिरी समय में पाला बदला?
क्या भाजपा ने पहले से कोई रणनीतिक तालमेल तैयार कर रखा था?
या फिर कहीं कोई ऐसा राजनीतिक समझौता हुआ, जिसकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई?

इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में डिप्टी मेयर और निगम की समितियों के गठन से भी मिल सकते हैं।

दूसरी तरफ भाजपा ने एक बार फिर अजमेर नगर निगम में अपना दबदबा कायम किया है। इस राजनीतिक सफलता में भाजपा संगठन की रणनीति और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका पर चर्चा होना स्वाभाविक है। जिला अध्यक्ष रमेश सोनी और विधायक वासुदेव देवनानी की जोड़ी ने यह संदेश जरूर दिया है कि चुनावी राजनीति केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि संगठन और अंतिम समय के राजनीतिक प्रबंधन का भी खेल है।

लेकिन भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। जिन निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से 43 का आंकड़ा बना है, उनके साथ आगे बोर्ड चलाना होगा। डिप्टी मेयर, समितियां और निगम के महत्वपूर्ण निर्णयों में इन पार्षदों की भूमिका क्या होगी—यह आने वाला समय बताएगा।

अजमेर की जनता के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है—कांग्रेस के 37 वोट कांग्रेस के साथ रहे, लेकिन भाजपा 32 से 43 तक कैसे पहुंची?

मेयर की कुर्सी पर अनामिका शर्मा बैठ चुकी हैं, मगर 43 वोटों का रहस्य अभी अजमेर की राजनीति में खुली किताब नहीं बना है।

**कहानी खत्म नहीं हुई है… असली राजनीतिक अध्याय अब शुरू हुआ है।

वीडियो देखें :

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