सिगरेट की ब्लैक नहीं रोक पाया प्रशासन… तो गैस की कालाबाज़ारी कैसे रुकेगी

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अजमेर । अजमेर शहर में पिछले लगभग दो महीनों से एक ऐसा दृश्य लगातार दिखाई दे रहा है जिसे न तो छिपाया जा सकता है और न ही अनदेखा किया जा सकता है। शहर की गलियों, मोहल्लों, बाजारों और सरकारी कार्यालयों के आसपास सिगरेट खुलेआम ब्लैक में बिक रही है। यह स्थिति केवल किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि नगर निगम के आसपास, स्वास्थ्य विभाग के कार्यालयों के बाहर, न्यायालय परिसर के पास, पुलिस थानों के आसपास और कई सरकारी दफ्तरों के सामने तक यही हालात दिखाई दे रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सब उस शहर में हो रहा है जहां कानून लागू करवाने वाली संस्थाएं कुछ ही दूरी पर मौजूद हैं। दुकानदार तय कीमत से अधिक वसूल रहे हैं, ग्राहक मजबूरी में भुगतान कर रहे हैं और यह सिलसिला बिना किसी भय के लगातार जारी है। शहर के लोग जानते हैं, दुकानदार जानते हैं, अधिकारी भी शायद जानते हैं—लेकिन कार्रवाई के ठोस उदाहरण बहुत कम दिखाई देते हैं।

बाजार में चर्चा है कि सिगरेट की एजेंसियों और सप्लाई चेन से जुड़े कुछ लोगों ने पिछले दो महीनों में ही सैकड़ों करोड़ रुपये का अवैध मुनाफा कमा लिया है। भले ही यह आंकड़े आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज न हों, लेकिन बाजार की वास्तविकता इस ओर संकेत जरूर करती है कि यह कारोबार छोटे स्तर का नहीं है।

यहीं से प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि किसी शहर में सिगरेट जैसी वस्तु महीनों तक खुलेआम ब्लैक में बिक सकती है और व्यवस्था उसे रोक नहीं पा रही, तो फिर यह भरोसा कैसे किया जाए कि गैस सिलेंडर जैसी आवश्यक वस्तु की कालाबाज़ारी को प्रभावी रूप से रोका जा सकेगा?

अजमेर की सड़कों पर दिनभर गैस से चलने वाले वाहन भी दिखाई देते हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं कि कई बार घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग वाहनों या व्यावसायिक कार्यों में किया जाता है। जब यह सब खुलेआम नजर आता है, तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि निगरानी व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है।

शहर के छोटे भोजनालय, ठेले और आम परिवार इन दिनों गैस सिलेंडर की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। लेकिन यदि कोई नागरिक वास्तव में किसी को ब्लैक मार्केटिंग करते हुए पकड़वाना चाहे, तो उसके पास ऐसा कोई स्पष्ट और सुरक्षित तंत्र नजर नहीं आता जहां शिकायत करने पर तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

दरअसल ब्लैक मार्केटिंग और मिलावटखोरी केवल आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि यह समाज के लिए आंतरिक आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक है। आतंकवाद कभी-कभी हमला करता है, लेकिन ब्लैक मार्केटिंग और मिलावटखोरी रोज़ाना आम आदमी की जेब, स्वास्थ्य और जीवन पर हमला करती है।

जब यह सब प्रशासनिक ढिलाई, संभावित मिलीभगत या जिम्मेदारी तय न होने की स्थिति में पनपता है, तो समस्या और गंभीर हो जाती है। ऐसे में यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है कि यदि भविष्य में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर कोई बड़ा संकट खड़ा होता है, तो सरकार आम जनता को राहत कैसे पहुंचाएगी?

इस स्थिति से निकलने का रास्ता केवल एक है—धरातली पारदर्शिता और स्पष्ट जवाबदेही। सरकार को अपने प्रशासनिक तंत्र से केवल कागजी रिपोर्ट नहीं बल्कि वास्तविक जमीनी आंकड़े मांगने होंगे। कितने निरीक्षण हुए, कितने मामलों में कार्रवाई हुई और किन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई—यह सब सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए।

क्योंकि यदि जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तो व्यवस्था केवल कागजों में मजबूत दिखाई देगी और जमीन पर काला बाज़ार अपनी जड़ें और गहरी करता जाएगा।

आज अजमेर की सड़कों से उठता यह सवाल केवल एक शहर का नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है—

जब सिगरेट की ब्लैक मार्केटिंग ही नहीं रुक पा रही, तो गैस की कालाबाज़ारी को रोकने का भरोसा आखिर किस आधार पर किया जाए?

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