‘कोरेक्स सिटी’ जैसे शब्दों से जुड़ता रीवा का नाम, नशीले कफ सिरप के अवैध कारोबार पर कार्रवाई के बावजूद नहीं थम रहे सवाल
रीवा। किसी शहर की पहचान उसकी संस्कृति, इतिहास, शिक्षा, प्रतिभा, विकास और उपलब्धियों से होनी चाहिए। लेकिन यदि इंटरनेट पर “Corex City of India” जैसे शब्दों के साथ किसी शहर का नाम सामने आए, तो यह केवल एक सर्च रिजल्ट नहीं, बल्कि उस शहर की सामाजिक छवि को लेकर गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।रीवा के संदर्भ में ‘कोरेक्स सिटी’ शब्द पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक चर्चा और समाचार रिपोर्टों का हिस्सा रहा है। वर्ष 2024 में सेमरिया विधायक ने भी रीवा को ‘कोरेक्स सिटी’ के नाम से बदनाम होने का मुद्दा उठाते हुए पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर कार्रवाई की मांग की थी।
रीवा की पहचान आखिर किस चीज से बनेगी?
रीवा की पहचान विंध्य की ऐतिहासिक धरती, सफेद बाघ, जलप्रपात, प्राकृतिक संपदा, शिक्षा और प्रतिभाशाली युवाओं से होनी चाहिए। लेकिन नशीले कफ सिरप के अवैध कारोबार से जुड़े मामलों और लगातार सामने आती पुलिस कार्रवाइयों ने एक अलग ही तस्वीर को जन्म दिया है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि रीवा का नाम नशीले कफ सिरप के कारोबार से जोड़कर देखा जाने लगा?यह सवाल केवल पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह सवाल युवाओं, परिवारों, मेडिकल व्यवस्था, प्रशासन और पूरे समाज से जुड़ा हुआ है।
कार्रवाई होती रही, फिर भी कारोबार पर सवाल क्यों?
रीवा में नशीली कफ सिरप के खिलाफ पुलिस द्वारा समय-समय पर कार्रवाई की गई है। अलग-अलग मामलों में बड़ी मात्रा में कफ सिरप जब्त करने के साथ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई है।लेकिन यदि कार्रवाई के बाद भी नशीले कफ सिरप की खेप लगातार पकड़ी जाती है तो यह जांच का विषय बनता है कि सप्लाई की पूरी श्रृंखला कहां से संचालित हो रही है और इसके पीछे कौन-कौन से नेटवर्क सक्रिय हैं।
सागर और प्रयागराज तक नेटवर्क की चर्चा
रीवा में नशीली कफ सिरप के कथित अवैध कारोबार को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों में सागर और प्रयागराज से जुड़े नेटवर्क का भी उल्लेख सामने आया था। मेडिकल एजेंसियों और फर्मों के लेनदेन की जांच की बात भी सामने आई।ऐसे में कार्रवाई केवल उस व्यक्ति तक सीमित रहने के बजाय पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी दिखाई देता है। आखिर माल कहां से आता है, किस माध्यम से पहुंचता है, कौन इसकी सप्लाई करता है और नशे के लिए इसका इस्तेमाल करने वालों तक यह कैसे पहुंचता है—ये सभी सवाल जांच के केंद्र में होने चाहिए।
‘कोरेक्स सिटी’ का दाग आखिर मिटेगा कैसे?
किसी शहर के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि उसकी चर्चा विकास, शिक्षा और रोजगार के बजाय नशीले पदार्थों के कारोबार से जुड़े शब्दों के कारण होने लगे।रीवा के युवाओं के सामने रोजगार और बेहतर भविष्य के अवसर खड़े करने की जरूरत है। वहीं नशे के अवैध कारोबार पर कार्रवाई को केवल गिरफ्तारी और जब्ती तक सीमित रखने के बजाय पूरे सप्लाई नेटवर्क, आर्थिक लेनदेन और अवैध कारोबार की जड़ों तक पहुंचाने की जरूरत है।
अब सवाल सिर्फ कोरेक्स का नहीं, रीवा की पहचान का है
रीवा को देश किस नाम से जानेगा?विंध्य की ऐतिहासिक धरती के रूप में?सफेद बाघ की धरती के रूप में?शिक्षा और प्रतिभाओं के शहर के रूप में?या फिर ‘कोरेक्स सिटी’ जैसे बदनाम शब्दों के साथ?यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि किसी शहर की बदनामी केवल उस शहर के वर्तमान को प्रभावित नहीं करती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पहचान पर भी असर डाल सकती है। नशीले कारोबार पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है वह परिस्थितियां खत्म करना, जिनके कारण रीवा का नाम ‘कोरेक्स सिटी’ जैसे शब्दों के साथ जुड़ रहा है।रीवा की पहचान नशे के कारोबार से नहीं, उसकी जनता, उसकी प्रतिभा, उसकी संस्कृति और उसके भविष्य से होनी चाहिए।
