सिरमौर में प्रस्तावित परमाणु परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का खुला विरोध; संजय सिंह समेत बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने जताई आपत्ति, बोले—ऐसी परियोजना नहीं चाहिए जो हमारी जिंदगी और भविष्य पर खतरा बने
रीवा। सिरमौर तहसील के सरई कला पंचायत अंतर्गत रोझौही में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर क्षेत्र का माहौल एक बार फिर गरमा गया है। परियोजना स्थल पर भू-तकनीकी जांच के लिए 8 बोरहोल किए जाने की प्रशासनिक प्रक्रिया सामने आने के बाद ग्रामीणों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें ऐसा विकास स्वीकार नहीं, जिसकी कीमत उनके जल, जमीन, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े।ग्रामीणों ने एक स्वर में नारा लगाया—“विकास चाहिए, विनाश नहीं।” उनका कहना है कि क्षेत्र में विकास कार्यों का वे विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन ऐसी परियोजना नहीं चाहते जिसे लेकर उनके मन में स्वास्थ्य, पर्यावरण, जलस्रोत और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े हों।
8 बोरहोल की जानकारी सामने आते ही बढ़ी हलचल
उपलब्ध प्रशासनिक पत्राचार के अनुसार रोझौही में प्रस्तावित स्थल पर कुल 8 बोरहोल किए जाने हैं। इनमें 4 बोरहोल 100 मीटर और 4 बोरहोल 50 मीटर तक गहरे प्रस्तावित बताए गए हैं। भू-तकनीकी जांच और बोर लॉगिंग अध्ययन को प्रस्तावित परियोजना स्थल के तकनीकी आकलन की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।दस्तावेजों में जांच के लिए फुग्रो एजेंसी तथा भूवैज्ञानिक एवं जियो-फिजिकल अध्ययन के लिए National Institute of Rock Mechanics (NIRM) का उल्लेख किया गया है। वहीं कार्य को NPCIL के तकनीकी मानकों के अनुरूप किए जाने की बात सामने आई है।हालांकि, भू-तकनीकी जांच शुरू होना अपने आप में परमाणु संयंत्र की अंतिम मंजूरी या निर्माण की अनुमति नहीं माना जा सकता। परियोजना के आगे बढ़ने के लिए संबंधित तकनीकी, पर्यावरणीय, वैधानिक और नियामकीय प्रक्रियाओं का पूरा होना आवश्यक होगा।
“हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए जो हमारी जिंदगी में खतरा पैदा करे”
प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास विरोधी नहीं हैं। क्षेत्र में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सिंचाई और दूसरी विकास परियोजनाओं का स्वागत किया जाएगा, लेकिन ऐसी परियोजना को लेकर वे सहमत नहीं हैं जिसे वे अपने जीवन और पर्यावरण के लिए संभावित खतरे से जोड़कर देख रहे हैं।ग्रामीणों का कहना है कि “विकास चाहिए, विकास चाहिए, विनाश नहीं” केवल नारा नहीं बल्कि उनकी मांग है। उनका कहना है कि क्षेत्र में ऐसी औद्योगिक या ऊर्जा परियोजना लाई जाए, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार और विकास मिले तथा वे अपने गांव में सुकून और सुरक्षित माहौल में जीवन जी सकें।
विरोध में ग्रामीणों ने एकजुट होकर उठाई आवाज

परियोजना के विरोध में संजय सिंह (सरपंच पति), चंद्रभूषण दुबे, विवेक पाण्डेय, गोलू पाल, बैजनाथ यादव, आनन्द पाण्डेय, मोहन प्रजापति, रामसुजान कोल, आदित्यनारायण पाण्डेय, शिवम पांडे, रामकरण प्रजापति, राजकुमार प्रजापति, मनफेर कोल, खेलारी कोल, छोटेलाल कोल, कधई साकेत, बृजेश गोंड़, श्यामलाल कोल, रामलाल कोल, रामायण कोल, रहीश कोल, संदीप कोल, संतोष कोल, मिथिलेश साकेत और सुखलाल कोल सहित अन्य ग्रामीणों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई।ग्रामीणों ने कहा कि रोझौही और आसपास का इलाका केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि उनके घर, खेत, जलस्रोत और पीढ़ियों की जीवन-व्यवस्था से जुड़ा क्षेत्र है। इसलिए किसी भी बड़ी परियोजना से पहले स्थानीय लोगों की चिंताओं और आपत्तियों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
शिवानंद द्विवेदी ने भी जताया विरोध
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी लंबे समय से प्रस्तावित परियोजना को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि स्थानीय लोगों की आपत्तियों और प्रधानमंत्री के नाम दिए गए ज्ञापनों के बावजूद परियोजना से जुड़ी प्रशासनिक गतिविधियां आगे बढ़ रही हैं।उन्होंने परियोजना को लेकर विस्थापन, पर्यावरण और स्थानीय संसाधनों से जुड़े सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि रोझौही में परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया जारी रहती है तो इसके खिलाफ जनआंदोलन के साथ न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प भी अपनाया जाएगा।
ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल—आगे क्या?
अब प्रशासनिक स्तर पर भू-तकनीकी जांच की प्रक्रिया और दूसरी ओर ग्रामीणों के विरोध ने रोझौही को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ परियोजना स्थल से जुड़े तकनीकी अध्ययन की गतिविधियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं, तो दूसरी तरफ स्थानीय ग्रामीण अपनी आपत्तियों के साथ खुलकर सामने आ गए हैं।ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि ऐसे विकास के खिलाफ हैं जिसे वे अपने अस्तित्व और भविष्य के लिए असुरक्षित मानते हैं। उनकी मांग है कि क्षेत्र में यदि कोई परियोजना लाई जाए तो वह स्थानीय लोगों के हित, पर्यावरणीय सुरक्षा और सुरक्षित जीवन को प्राथमिकता देने वाली हो।फिलहाल रोझौही में उठी आवाज केवल एक परियोजना के विरोध तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि ग्रामीण इसे “कैसा विकास चाहिए?” के सवाल से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में प्रशासन ग्रामीणों की आपत्तियों को किस स्तर पर सुनता है और प्रस्तावित परियोजना से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर सभी की निगाहें रहेंगी।
