अजमेर। वैशाली नगर के ईदगाह चौराहे पर शुक्रवार को उस समय हंगामा खड़ा हो गया, जब रेलवे की कथित चोरी की संपत्ति बरामद करने पहुंची RPF टीम को कबाड़ी के परिजनों के विरोध का सामना करना पड़ा। कार्रवाई के दौरान कबाड़ी की पत्नी के RPF वाहन के आगे सड़क पर लेट जाने से मौके पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस ने समझाइश कर मामला शांत कराया।
बताया गया कि RPF टीम रेलवे संपत्ति चोरी के मामले में पहले पकड़े गए आरोपी बादल की निशानदेही पर ईदगाह रोड स्थित कबाड़ी निजाम की दुकान पर पहुंची थी। टीम का उद्देश्य चोरी की बताई जा रही रेलवे संपत्ति को बरामद करना था। कार्रवाई के दौरान ही कबाड़ी के परिवार और RPF टीम के बीच विवाद बढ़ गया और देखते ही देखते मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई।
मामले ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया, जब कबाड़ी के परिजनों ने RPF अधिकारियों पर ₹50 हजार लेने का आरोप लगाया। परिजनों का कहना है कि निजाम को छोड़ने के लिए उससे ₹50 हजार लिए गए, लेकिन इसके बावजूद उसे करीब दो दिन तक हिरासत में रखा गया और छोड़ा नहीं गया। यह आरोप फिलहाल परिजनों की ओर से लगाया गया है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि या न्यायिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
विवाद के दौरान परिजनों ने एक और गंभीर आरोप लगाया। उनका कहना था कि RPF टीम शुक्रवार को कथित चोरी का माल अपने साथ कट्टे में लेकर दुकान पर आई और बाद में उसी सामान को दुकान से बरामद दिखाने की कोशिश की गई। इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं हुई है। ऐसे में पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि बरामदगी की कार्रवाई किस प्रक्रिया के तहत हुई और मौके से वास्तव में क्या-क्या सामान बरामद किया गया।
मामले में RPF थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह से संपर्क करने का प्रयास किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। वहीं RPF कमिश्नर योगेंद्र कुमार ने बताया कि टीम चोरी का माल रिकवर करने गई थी और मौके पर हंगामा हुआ। उन्होंने मामले को चेक करवाकर जांच कराने की बात कही।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रेलवे की संपत्ति चोरी हुई या नहीं, बल्कि सवाल यह भी है कि बरामदगी की पूरी कार्रवाई किस प्रक्रिया के तहत हुई? ₹50 हजार लेने का आरोप किस आधार पर लगाया गया? यदि पैसा लिया गया तो उसकी जांच कैसे होगी? और यदि आरोप गलत है तो उसकी सच्चाई सामने लाने के लिए जिम्मेदारी किसकी होगी?
रेलवे संपत्ति की चोरी गंभीर अपराध है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन किसी भी कार्रवाई की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ₹50 हजार के आरोप ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। अब निगाहें RPF की जांच पर हैं कि वह केवल चोरी की संपत्ति की बरामदगी तक सीमित रहती है या कार्रवाई के दौरान लगाए गए इन गंभीर आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होती है।
चोरी का माल किसका था, दुकान तक कैसे पहुंचा, बरामदगी कैसे हुई और ₹50 हजार के आरोप की सच्चाई क्या है? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आना चाहिए।
