ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 से बदलेगी शहरों की तस्वीर, चार-धारा पृथक्करण से डिजिटल निगरानी तक नई व्यवस्था
जयपुर। शहरों की सफाई व्यवस्था अब केवल सड़क से कचरा उठाने और उसे डंपिंग स्थल तक पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेगी। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 ने कचरे को समस्या के बजाय संसाधन में बदलने की दिशा में नई व्यवस्था का खाका तैयार किया है। नियमों के तहत अब कचरे का स्रोत पर ही पृथक्करण, वैज्ञानिक प्रसंस्करण, डिजिटल निगरानी और नियम तोड़ने वालों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति जैसी व्यवस्थाओं को अधिक मजबूती दी गई है। शुक्रवार को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल में पत्र सूचना कार्यालय, जयपुर के सहयोग से आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन प्रावधानों की जानकारी दी गई।
चार डिब्बों में बंटेगा कचरा, तभी बदलेगी व्यवस्था— नए नियमों में सबसे महत्वपूर्ण जोर कचरे को स्रोत पर अलग करने पर है। गीला कचरा, सूखा कचरा, स्वच्छता संबंधी कचरा तथा विशेष/घरेलू खतरनाक कचरे को अलग-अलग रखना और संग्रहित करना व्यवस्था की आधारशिला बनाया गया है। सवाल अब यह है कि घर से निकलने वाले कचरे को यदि वहीं अलग नहीं किया गया तो आगे की पूरी वैज्ञानिक व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी? यही वह बिंदु है जहां नियमों की सफलता केवल सरकारी मशीनरी नहीं, बल्कि नागरिकों की आदत और स्थानीय निकायों की निगरानी पर भी निर्भर करेगी।
बड़े कचरा उत्पादकों पर भी जिम्मेदारी— नए प्रावधानों में बड़े आवासीय परिसरों, होटल, संस्थानों और अन्य निर्धारित श्रेणी के थोक अपशिष्ट उत्पादकों की जिम्मेदारी स्पष्ट की गई है। ऐसे प्रतिष्ठानों को अपने परिसर में जैविक कचरे के प्रसंस्करण के लिए कम्पोस्टिंग, जैव-मीथेनीकरण अथवा अन्य अनुमोदित तकनीकों का उपयोग करना होगा। पुनर्चक्रण योग्य और खतरनाक कचरे को अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से निस्तारित करना भी उनकी जिम्मेदारी होगी।
कचरा उठाया कहां और पहुंचा कहां—अब डिजिटल निगरानी का सवाल: नियमों के तहत कचरे के संग्रहण से लेकर परिवहन, प्रसंस्करण और अंतिम निस्तारण तक ऑनलाइन निगरानी एवं अनुश्रवण व्यवस्था विकसित किए जाने पर जोर है। इससे व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने और जवाबदेही तय करने में मदद मिलेगी। यानी भविष्य में केवल यह दावा पर्याप्त नहीं होगा कि कचरा उठा लिया गया; उसकी आगे की यात्रा पर भी निगरानी की व्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य है।
डंपिंग ग्राउंड पर निर्भरता घटाने की तैयारी— नए नियमों में सामग्री पुनर्प्राप्ति केंद्रों को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। सूखे कचरे में मौजूद पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अधिकतम मात्रा में वापस हासिल करने का प्रयास होगा। वहीं कचरा भराव स्थलों पर दबाव कम करने के लिए उद्योगों में अपशिष्ट-व्युत्पन्न ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देने तथा पुराने विरासत कचरा स्थलों के वैज्ञानिक उपचार पर जोर दिया गया है।
कचरे से कार्बन क्रेडिट तक की राह— कम्पोस्टिंग, जैव-मीथेनीकरण और अन्य वैज्ञानिक प्रसंस्करण गतिविधियों के माध्यम से कार्बन क्रेडिट अर्जित करने की संभावनाओं का लाभ उठाने की दिशा में भी प्रोत्साहन दिया गया है। यानी कचरा प्रबंधन अब केवल सफाई का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण और चक्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा आर्थिक मॉडल भी बन सकता है।
नियम तोड़े तो ‘प्रदूषक भुगतान’ करेगा— नए नियमों में ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ को भी शामिल किया गया है। अपशिष्ट प्रबंधन संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति अथवा संस्थाओं पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाए जाने का प्रावधान है। इससे नियमों के अनुपालन को मजबूती मिलने की उम्मीद है। हालांकि असली परीक्षा यह होगी कि इन प्रावधानों को जमीन पर कितनी नियमितता और निष्पक्षता से लागू किया जाता है।
राजस्थान में निगरानी तंत्र सक्रिय— राज्य में नियमों के क्रियान्वयन के लिए राज्य स्तरीय निगरानी समिति गठित की गई है। 29 मई 2026 को आयोजित क्षेत्रीय कार्यशाला में शहरी स्थानीय निकायों, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के करीब 600 प्रतिभागियों ने भाग लिया। सभी शहरी स्थानीय निकायों में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के केंद्रीकृत पोर्टल पर थोक अपशिष्ट उत्पादकों का अंतरिम पंजीकरण भी शुरू किया गया है।
अब असली सवाल—नियम कितने कागज पर, कितने जमीन पर? ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 का उद्देश्य स्पष्ट है—कचरे को निस्तारण की अंतिम वस्तु नहीं, बल्कि पुनर्चक्रण, पुनःउपयोग और संसाधन पुनर्प्राप्ति के माध्यम से उपयोगी संसाधन बनाया जाए। लेकिन किसी भी नियम की असली तस्वीर उसके प्रावधानों में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में दिखाई देती है। घर से निकलने वाले कचरे के चार-धारा पृथक्करण से लेकर बड़े अपशिष्ट उत्पादकों की जवाबदेही, डिजिटल निगरानी और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति तक—हर कड़ी यदि ईमानदारी से लागू हुई तो शहरों की सफाई व्यवस्था का स्वरूप बदल सकता है। वरना कागज पर वैज्ञानिक व्यवस्था और जमीन पर पुराने ढर्रे के बीच अंतर बना रहेगा।
