अजमेर। अजमेर के चन्द्रवरदाई नगर में जीएनएम नर्सिंग स्कूल का शिलान्यास हुआ—7 करोड़ की लागत, बड़े-बड़े वादे, और उससे भी बड़ी उम्मीदें। मंच सजा, भीड़ जुटी, फोटो खिंचे… और फिर वही पुराना सवाल—“अब आगे?”
कार्यक्रम में सांसद भागीरथ चौधरी जी मौजूद थे। मंच पर खड़े होकर उन्होंने भाषण देने की कोशिश की, मगर शब्द जैसे उनसे रूठे-रूठे से लगे। उधर सामने बैठे नेता गण भी कुछ ज़्यादा प्रभावित नहीं दिखे—कोई मोबाइल में व्यस्त, तो कोई इधर-उधर नजरें घुमाते हुए। ऐसा लग रहा था जैसे भाषण कम, औपचारिकता ज़्यादा निभाई जा रही हो।
अब इसे संयोग कहें या “जोग”—नेताजी के आने से पहले ही आंधी-बारिश ने तंबू उखाड़ दिए। कुर्सियां खाली हो गईं, टेंट उड़ गए। मानो प्रकृति खुद पूछ रही हो—“कब तक अजमेर को सिर्फ शिलान्यासों की ऑक्सीजन पर जिंदा रखोगे?”
नींव रखने से पहले ही संकेत मिल गया—काम ज़मीन पर उतरेगा या फिर हवा में ही उड़ जाएगा?
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मजेदार बात ये भी रही कि जो कभी पार्टी से बगावत कर चुके थे, वही अब सांसद महोदय के स्वागत-सत्कार में सबसे आगे दिखे। राजनीति में ये “रीचार्ज प्लान” बड़ा तेज चलता है—कल तक विरोध, आज पूरी खुशामद। और मंच का नज़ारा देखिए—सांसद जी खड़े होकर बोल रहे थे, और बाकी सभी आराम से कुर्सियों पर बैठे “गंभीरता” से सुन रहे थे… या कम से कम ऐसा दिखा रहे थे।
अब बात असली मुद्दे की—यह नर्सिंग कॉलेज बनेगा, जरूर बनेगा… लेकिन कब?
कहीं ऐसा तो नहीं कि ये भी अजमेर के “विकास संग्रहालय” की एक और प्रदर्शनी बन जाए?
जहां पहले से ही आईटी पार्क, खेल मैदान, स्कूल बिल्डिंग, रिंग रोड, लेपर्ड पार्क, सेवन वंडर, म्यूजिकल फव्वारे जैसे कई “शानदार सपने” धूल खा रहे हैं।
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जनता भी समझदार है—हर शिलान्यास पर ताली बजाती है, हर वादे पर भरोसा जताती है… और फिर अगले चुनाव में उसी भरोसे को “वोट” में बदल देती है।
यही अजमेर की खासियत है—यहां विकास के सपनों को भी सम्मान मिलता है, चाहे वो पूरे हों या सिर्फ पोस्टर पर ही क्यों न रह जाएं।
तो फिलहाल, अजमेर को एक और “झुनझुना” मिल गया है।
अब देखना ये है—इससे आवाज़ निकलती है या सिर्फ उम्मीदें ही बजती रहती हैं।

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