प्रशासनिक लापरवाही , सनातन को दो हिस्सों में बाँटने की राजनीति पर संतों में रोष
प्रयागराज । शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर के बाहर कुछ असामाजिक तत्व लाठी–डंडे और भगवा झंडे लेकर पहुंचे । जहां उन्होंने नारे बाजी का तोड़फोड़ की इससे माहौल तनावपूर्ण हो गया साधु, संतों और श्रद्धालुओं में अचानक हुई इस घटना से दहशत फैल गई।
शंकराचार्य की ओर से इस बाबत एक शिकायत थाने पर दी गई । शिकायत में बताया कि शिविर के बाहर पहुंचे कुछ असामाजिक तत्वों ने “आई लव बुलडोजर बाबा” के नारे लगाए। इसे संतों और श्रद्धालुओं ने राजनीतिक संरक्षण मानते हुए सोची समझी साजिश बताया । स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस पूरे घटनाक्रम की थाने में लिखित रिपोर्ट देकर शिकायत दर्ज कराई है।
ABP न्यूज़ के अनुसार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले आठ दिनों से धरने पर हैं। इस दौरान प्रशासन और शंकराचार्य के बीच विवाद की स्थिति बनी हुई है। ऐसे संवेदनशील समय में शिविर की सुरक्षा में चूक और हंगामे की घटना ने प्रशासनिक तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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धार्मिक शिविर जैसे संवेदनशील आयोजनों में सुरक्षा की जिम्मेदारी सीधे प्रशासन और पुलिस पर होती है। असामाजिक तत्वों का शिविर तक लाठी–डंडों के साथ नारेबाजी करना पुलिस प्रशासन की सतर्कता और निगरानी के दावों की पोल खोलता है । शंकराचार्य ने स्पष्ट किया है कि इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
इस मामले पर जुना अखाड़े के महंत बाबा बालक नाथ ने घटना को राजनीतिक द्वेषता और धार्मिक परम्पराओं पर राजनीतिक अतिक्रमण बताया । उन्होंने इसे देश में सनातन धर्म को दो हिस्सों में बाँटने वाली राजनीति करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते राजनीति ने अपना रुख नहीं बदला, तो इस तरह के अपमान के विरोध में चारों शंकराचार्यों सहित लाखों साधु–संत मिलकर निर्णय लेंगे और धर्म ध्वजा की रक्षा करेंगे।
महंत बाबा बालक नाथ ने यह भी कहा कि जिस प्रकार सरकार धीरे-धीरे धार्मिक स्थलों और मठों पर हस्तक्षेप कर रही है, वह सनातन परंपराओं के विपरीत है। इसे सरकार को गंभीरता से समझना होगा । उन्होंने सरकार से मांग की कि हंगामा करने वालों पर तत्काल और सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
शंकराचार्य का शिविर केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन चेतना, शास्त्रीय परंपरा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का केंद्र है। ऐसे स्थलों पर हिंसा, नारेबाज़ी और राजनीतिक उकसावे से धर्म की मूल भावना—शांति, संयम और विवेक—आहत होती है। यह घटना चेतावनी है कि यदि प्रशासन सतर्क नहीं हुआ, तो सामाजिक ताने-बाने में एक बड़ा विस्फोट कभी भी हो सकता है ।
प्रयागराज की यह घटना प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक उकसावे और धार्मिक मर्यादा के उल्लंघन की खतरनाक जुगलबंदी को उजागर करती है। जरूरत है कि शासन–प्रशासन निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ कार्रवाई करे, ताकि सनातन परंपराओं की गरिमा बनी रहे और भविष्य में किसी भी प्रकार की अशांति रोकी जा सके।
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