अरावली बचाने की शुरुआत पुष्कर से होनी चाहिए

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जयपुर/अजमेर | सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए हाई-पावर कमेटी बना दी है। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन राजस्थान की जनता के मन में एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या यह कमेटी केवल रिपोर्ट तैयार करेगी या वास्तव में अरावली को बचाने का साहस भी दिखाएगी?
यदि सरकार और प्रशासन सचमुच अरावली संरक्षण को लेकर गंभीर हैं तो इसकी शुरुआत अजमेर जिले के पुष्कर से होनी चाहिए। क्योंकि आज पुष्कर केवल एक धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि अरावली के सामने खड़े संकट का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
पिछले कुछ वर्षों में एक नया चलन तेजी से बढ़ा है। पहले किसी पहाड़ी या रेतीले टीले पर छोटा मंदिर या धार्मिक स्थल बनाया जाता है। फिर उसके आसपास दुकानें खड़ी हो जाती हैं। कुछ समय बाद ट्रस्ट या संस्था का गठन होता है। उसके बाद स्थायी निर्माण, पार्किंग, रेस्टोरेंट, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। धीरे-धीरे पूरा क्षेत्र निजी कब्जे और व्यावसायिक हितों का केंद्र बन जाता है। सवाल यह है कि क्या हाई-पावर कमेटी ऐसे मामलों की भी जांच करेगी?
आज पुष्कर घाटी में अरावली की ढलानों पर बने अनेक निर्माण खुलेआम दिखाई देते हैं। कई स्थानों पर पहाड़ों की प्राकृतिक बनावट बदल चुकी है। रेतीले टीले, जो कभी पुष्कर की पहचान हुआ करते थे, लगातार समाप्त हो रहे हैं। अनन्ता क्षेत्र से लेकर चमत्कारी बालाजी के सामने तक, अरावली की तलहटी में बड़े-बड़े कंक्रीट ढांचे खड़े हो रहे हैं। ब्रह्मा मंदिर क्षेत्र के आसपास के अनेक प्राकृतिक टीले इतिहास बन चुके हैं। कपालेश्वर महादेव क्षेत्र में दुकानों और पार्किंग के विस्तार ने प्राकृतिक स्वरूप को प्रभावित किया है। पुराने मेला मैदान से लेकर नए विकसित क्षेत्रों तक भूमि समतलीकरण और कॉलोनियों रिसॉर्ट,होटल,रेस्टोरेंट का निर्माण लगातार जारी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या जो कुछ हो चुका है उसे वैध मानकर बख्श दिया जाएगा, जैसा अक्सर होता आया है? या फिर प्रशासन साहस दिखाकर अवैध निर्माणों, अतिक्रमणों और पर्यावरणीय क्षति की निष्पक्ष समीक्षा कर कार्रवाई भी करेगा !
पुष्कर केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है। यह आस्था, संस्कृति, इतिहास और प्रकृति का संगम है। यदि इसके रेतीले टीले, पहाड़ियां और प्राकृतिक घाटियां समाप्त हो गईं तो आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों में ही उस पुष्कर को देख पाएंगी जिसकी पहचान कभी प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण हुआ करती थी।
सरकार को चाहिए कि अरावली क्षेत्र में बने तथाकथित आश्रमों, ट्रस्टों, संस्थाओं और स्थायी-अस्थायी निर्माणों का व्यापक सर्वे कराया जाए। उनकी भूमि, स्वामित्व, उपयोग और वैधता की जांच हो। जिन संस्थाओं ने मूल उद्देश्य से हटकर व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है, उनके अधिकारों की समीक्षा की जाए। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे क्षेत्रों को देवस्थान विभाग अथवा अन्य सक्षम सार्वजनिक प्राधिकरण के अधीन लाकर संरक्षण की व्यवस्था बनाई जाए, ताकि भविष्य में अनधिकृत कब्जों और निर्माणों पर प्रभावी नियंत्रण हो सके।
अरावली बचाने का संघर्ष केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं है। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की परीक्षा भी है। यदि सरकार वास्तव में अरावली को बचाना चाहती है तो उसकी शुरुआत रिपोर्टों से नहीं, बल्कि पुष्कर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ठोस कार्रवाई से होनी चाहिए।
आज आवश्यकता नई समितियों की नहीं, बल्कि स्पष्ट नीयत और दृढ़ कार्रवाई की है। क्योंकि अरावली को भाषण नहीं, संरक्षण चाहिए। और यदि अरावली को बचाना है तो शुरुआत पुष्कर के रेतीले टीलों, पहाड़ियों और उसकी मूल पहचान को बचाने से ही करनी होगी।


संभावित शीर्षक:
अरावली बचानी है तो शुरुआत पुष्कर से करें
पुष्कर के रेतीले टीले पुकार रहे हैं: क्या हाई-पावर कमेटी सुनेगी?
मंदिर, ट्रस्ट और कब्जे: अरावली के सामने सबसे बड़ा सवाल
पुष्कर की खोती पहचान और अरावली बचाने की चुनौती

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