संत परम्परा बनाम बाबा संस्कृति : किस ओर जा रहा है सनातन ?

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राजनीति की दोहरी नीति में फँस रहा है सनातन?

भारत की सनातन सभ्यता केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि संत, महंत, शंकराचार्य और मठ परम्पराओं से निर्मित एक गहरी सामाजिक चेतना है। सदियों से यही संत परम्परा समाज को नैतिक दिशा देती रही है। लेकिन वर्तमान समय में यह प्रश्न लगातार गहराता जा रहा है कि क्या देश की राजनीति अब सनातन को भी अपनी सुविधा के अनुसार चलाएगी ।

एक ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा संतों, महंतों और मठाधीशों से उनके पदों के वैधानिक दस्तावेज दिखाने की बात कह रही है। वहीं दूसरी ओर राजस्थान सरकार और केंद्रीय राजनीति राज्यसभा और लोकसभा छोड़कर बाबाओं के चरणों में दिखाई दे रहे है । यह बाबा हाल के वर्षों में ही भीड़ और प्रचार के दम पर अचानक प्रभावशाली बनकर उभरे हैं।

सनातन परम्परा में संत पद तप, त्याग, ब्रह्मचर्य और शास्त्रज्ञान से प्राप्त होता है। यह कोई मंच, प्रचार या भीड़ से मिलने वाला पद नहीं होता है। लेकिन आज स्थिति यह है कि जिसके पास लाखों की भीड़ है, वही बड़ा धार्मिक गुरु कहलाता है।

सतुवा बाबा, बाबा बागेश्वर,रामदेव बाबा जैसे लोगों को मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया और नेताओं का उनके कार्यक्रमों में शामिल होना दर्शाता है कि राजनैतिक संरक्षण प्राप्त इन बाबाओं के द्वारा देश में संत परम्परा की जगह धीरे-धीरे ‘बाबा संस्कृति’ को स्थापित किया जा रहा है।

राम रहीम, आसाराम, बाबा रामदेव जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि राजनीति और मीडिया बाजार मिलकर किस तरह धार्मिक चेहरों को ब्रांड में बदल रहे हैं। सवाल यह नहीं कि हर बाबा गलत है, सवाल यह है कि क्या आज संत और शंकराचार्य की जगह भीड़ जुटाने की क्षमता रखने वाले बाबाओं को ही आध्यात्मिक और सनातनी प्रमाण पत्र इन राजनैतिक लोगों द्वारा दिया जायेगा ।

इस पूरी प्रक्रिया में एक और गंभीर संकेत उभरकर सामने आता है—मठों, मंदिरों और आश्रमों पर बढ़ता सरकारी नियंत्रण। देश के कई राज्यों में मंदिरों के ट्रस्ट सरकार के अधीन किए जा रहे हैं, मठों की संपत्तियों पर प्रशासन की निगरानी है और धार्मिक पदों में अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप के चलते सनातन को भी दो हिस्सों में बांटा जा रहा है । यह स्थिति भविष्य में धार्मिक स्थलों और पदों पर सरकारी नियंत्रण की ओर इशारा करती है ।

जब धर्म को राजनीति संचालित करने लगेगी, तब वह धर्म नहीं बल्कि सत्ता का औजार बन जाएगा । आज राजनीति की नई रणनीति साफ दिखाई देती है—जहाँ आस्था, वहाँ वोट जिस बाबा के पास भीड़, वहीं नेताओं का अंबार दिखाई देता है । इसका परिणाम यह होगा कि आने वाली पीढ़ी संत और शंकराचार्यों को इतिहास की पुस्तकों में पढ़ेगी, जबकि टीवी और सोशल मीडिया पर दिखने वाले बाबाओं को ही भगवान मानने लगेगी।

यह सनातन का विकास नहीं, बल्कि उसका विकृतिकरण होगा। सनातन का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि विवेक, मर्यादा और आत्मबोध है। यदि यह चेतना समाप्त हुई, तो धर्म केवल राजनीतिक उत्सव और संसद में मनोरंजन बनकर रह जाएगा।

कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म की रक्षा के लिए स्पष्ट चेतावनी दी थी—
“धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।”
अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर प्रकट होते हैं। लेकिन इसका भावार्थ यह भी है कि समाज को स्वयं जागना पड़ता है। मौन रहकर अधर्म को बढ़ने देना भी अपराध है।

आज निर्णय जनता के हाथ में है। संत, महंत और शंकराचार्य के पदों को राजनीति से मुक्त रखना होगा। धर्म को वोट बैंक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर मानना होगा। यदि आज जनता ने आस्था के नाम पर भ्रमित होना नहीं छोड़ा, तो आने वाला समय सनातन के लिए अत्यंत कठिन होगा।

यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि सनातन की आत्मा की रक्षा की है। धर्म राजनीति से बड़ा है और सनातन सत्ता से।
अब प्रश्न यह नहीं कि राजनीति क्या कर रही है, बल्कि यह है कि जनता कब जागेगी इसे सत्ता और सनातन का अर्थ कब समझ आयेगा ।

महंत रामचंद्र गिरी जी महाराजजूना अखाड़ा

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