इंदौर।(मीडिया)
मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासन में एक बार फिर यह सवाल गूंज उठा है—क्या जनता की मौतों से ज्यादा अफसरों की कुर्सियां अहम हैं? इंदौर के भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में दूषित पेयजल से 24 लोगों की मौत के बाद जिस अधिकारी को जिम्मेदारी तय करते हुए पद से हटाया गया था, उसे महज 16 दिन बाद एक अहम निगम की कमान सौंप दी गई।
इंदौर नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त दिलीप यादव को जल प्रदूषण कांड के बाद हटाया गया था। उस समय सरकार ने इसे सख्त कार्रवाई के तौर पर पेश किया। लेकिन अब उसी अधिकारी को मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम का प्रबंध निदेशक (एमडी) नियुक्त कर देना सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दूषित पानी से फैली बीमारी ने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया था। कई परिवारों ने अपनों को खोया, बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इसकी चपेट में आए। यह हादसा प्राकृतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा माना गया। इसके बावजूद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आज तक अधूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर 24 मौतों के बाद भी किसी अधिकारी को बेहतर पद मिल सकता है, तो जवाबदेही का डर किसे रहेगा? क्या यह कार्रवाई थी या केवल जनता का गुस्सा शांत करने का अस्थायी नाटक?
विपक्ष ने इस फैसले को “मौत के बदले पद” करार देते हुए कहा है कि यह न केवल मृतकों का अपमान है, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को खुली छूट देने जैसा है। आम नागरिकों में भी रोष है कि जिनके अपनों की जान गई, उन्हें आज तक न न्याय मिला, न भरोसा।
साफ संदेश यही है—
यह मामला सज़ा का नहीं, सिस्टम द्वारा अपने लोगों को बचाने का उदाहरण बन गया है।
और असली सवाल अब भी कायम है—24 मौतों की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
