आठ महीने से डुबा दिल्ली का किराड़ी, सवाल सिर्फ पानी का नहीं — गुम होती लोकतंत्र की ताकत का ?

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शरद शर्मा की रिपोर्ट

दिल्ली की राजधानी में बसा किराड़ी इलाका आठ महीनों से पानी में डूबा है, लेकिन इससे भी ज्यादा खतरनाक है वहाँ जिम्मेदारियों का डूब जाना। गलियों में भरा गंदा पानी सिर्फ प्रशासन की नाकामी नहीं दिखाता, बल्कि यह उस राजनीतिक सोच का आईना है, जिसमें पार्टी का झंडा जीवन से बड़ा हो जाता है।

यहाँ सड़कें नहीं, तालाब हैं। सीवर नहीं, उफनते नाले हैं। घर नहीं, कैदखाने हैं। बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं, बुजुर्ग बीमारियों से जूझ रहे हैं और दुकानदार रोज़ नुकसान गिन रहे हैं। बरसात कब की चली गई, लेकिन किराड़ी आज भी उसी पानी में फंसा है ।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि जलभराव क्यों है,
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आठ महीने तक जनता की आवाज़ कौन सुन रहा था?

किराड़ी की यह हालत देश को एक कड़ा सबक देती है —
वोट पार्टी को नहीं, जवाबदेह इंसान को दीजिए।
चुनाव के वक्त बड़े-बड़े वादे, झंडे और नारों के पीछे छिपे चेहरे बाद में न गलियों में दिखते हैं, न दफ्तरों में।

स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतें दर्ज हुईं, ज्ञापन दिए गए, फोटो भेजे गए, वीडियो वायरल हुए — लेकिन नेता दिल्ली में हैं, किराड़ी में नहीं। यही वह फर्क है जो जनता को समझना होगा। जब नेता बाहर से आता है, तो उसे मोहल्ले की बदबू नहीं, सिर्फ कुर्सी की खुशबू आती है।

किराड़ी आज पूछ रहा है —
क्या पार्टी का टिकट इतना पवित्र है कि जनता की जिंदगी से बड़ा हो गया?
क्या स्थानीय निवासी दिल्ली के नहीं या किसी राजैतिक माफिया की दुश्मनी के शिकार हैं?

यह रिपोर्ट सिर्फ किराड़ी की कहानी नहीं है,
यह देश के हर उस डूब क्षेत्र इलाकों में आने वाली आहट की तस्वीर है जहां सत्ता,शासन,प्रशासन अपने हाथ खड़े के दें और जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए ।
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ बटन दबाना नहीं,
लोकतंत्र का मतलब है — गलती पर नेता को पकड़ना और अगली बार बेहतर चुनना।

किराड़ी का गंदा पानी देश को आईना दिखा रहा है।
अब तय जनता को करना है — कि उन्हें कैसा नेता या
झंडा चुनना है कि जो उनके जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी कर सके जो ज़मीन से जुड़ा अपने क्षेत्र का हो ।

वीडियो लिंक सौजन्य: शरद शर्मा

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