दीया कुमारी के कार्यक्रम ने खोल दी भाजपा की ज़मीनी हकीकत
अजमेर।
राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी का अजमेर दौरा और जनप्रतिनिधियों प्रशासन से संवाद कार्यक्रम जितना चमकदार मंच से दिखाया गया, उतना ही खोखला ज़मीनी सच्चाई में नज़र आया। तस्वीरें खुद गवाही दे रही हैं कि यह संवाद जनता से नहीं, बल्कि कैमरों से था; सवाल सुनने के लिए नहीं, बल्कि ऊपर तक फोटो भेजने तक सीमित?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है, तो फिर अजमेर भाजपा के वे जनप्रतिनिधि कहां थे जिन्हें पार्टी की रीढ़ कहा जाता है? क्यों भाजपा का एक बड़ा धड़ा इस कार्यक्रम से दूरी बनाए रहा? यह चुप्पी और दिया कुमारी का अजमेर की राजनीति में हस्तक्षेप भीतर ही भीतर पक रही असंतोष की आग की ओर इशारा कर रही है ।
बार-बार दौरे, लेकिन अजमेर की जनता खाली हाथ
उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी पिछले एक वर्ष में तीन से चार बार अजमेर आ चुकी हैं। हर बार मंच सजा, माइक लगे, शिलान्यास हुए, आश्वासन बंटे। लेकिन आम अजमेरी आज भी वही सवाल पूछ रहा है—
पानी मिलेगा कब?
सड़कें ठीक कब होंगी?
ट्रैफिक, अतिक्रमण के नाम पर बेरोज़गार किए गए छोटे दुकानदारों का समाधान कौन करेगा? विभागों में बैठे भ्रष्टचारियों ,स्मार्टी सिटी के दोषियों को कब सजा मिलेगी?
इन दौरों के बाद अजमेर की जनता को ऐसा विकास नहीं दिखा जो प्रदेश की उपमुख्यमंत्री से जनता को उम्मीद थी । विधायक विकास घोषणा प्रतिदिन अखबारों ,मीडिया में फोटो सहित जनता देखती है, लेकिन धरातल पर कांटा को काम दिखाई नहीं देता । प्रशासनिक हालात बताते हैं कि एक साथ अजमेर में इतने कार्यों को करने के लिए मेन पावर,संसाधन,मशीनरी का अभाव है । ऐसे में कार्यों का समय पर होना और गुणवत्ता के साथ होना दोनों ही हमेशा सवालों के घेरे में रहा ।
जनता अब मूर्ख नहीं है
कार्यक्रम में चंद लोगों की मौजूदगी इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि अजमेर की जनता अब सब समझ चुकी है। उसे पता है कि चुनाव से पहले मंच पर, नारियल फोड़े जाएंगे, और चुनाव से पहले और बाद में वही चेहरे जनता के सामने होंगे जिन्होंने आज तक समस्याएं जस की तस रख अपनी राजनीतिक रोटी सेकते आए ।
जनता यह भी देख रही है कि किस तरह सामान्य वर्ग, पर हो रहे अत्याचारों और आम नागरिक पर रोज़मर्रा की परेशानियों को दरकिनार कर समाज विशेष ,जातिगत राजनीति के आधार पर सत्ता में बनी रहना चाहती है।
चहेतों के घेरे में सत्ता, भीतरघात का खतरा
सबसे खतरनाक संकेत यह है कि अजमेर में उपमुख्यमंत्री को कुछ चुनिंदा चेहरों के इर्द-गिर्द घेर कर रखा जा रहा है। न ज़मीनी कार्यकर्ता, न असल जनप्रतिनिधि, न जनता की खुली बात। अगर यही रवैया जारी रहा तो आने वाले चुनावों में भाजपा को विरोध से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर से होने वाले नुकसान से जूझना पड़ेगा।
जनता का सीधा सवाल
अजमेर की जनता अब काम का हिसाब मांग रही है।
अब वह पूछ रही है—
कितनी बार आने से शहर बदलेगा?
कितने शिलान्यासों से ज़िंदगी सुधरेगी?
और कितनी तस्वीरों के बाद हमारी सुनी जाएगी?
अगर सत्ता ने इस सवाल को अब भी अनसुना किया, तो यह दूरी चुनावी नतीजों में साफ दिखाई देगी। क्योंकि जनता भले शांत हो, लेकिन वह सब देख रही है… और सब याद भी रखेगी।
