पत्रकारों को मिली बड़ी राहत, प्रेस स्वतंत्रता पर फिर छिड़ी बहस..
मामला क्या है
1. गैग ऑर्डर क्या था
दिल्ली : 6 सितंबर 2025 को दिल्ली की रोहिणी कोर्ट (Senior Civil Judge, Anuj Kumar Singh की अदालत) ने एक एकपक्षीय (ex parte) आदेश पारित किया था जिसका लक्ष्य था कि कुछ पत्रकारों/क्रिएटर्स द्वारा अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) से जुड़े उन रिपोर्टों या पोस्ट्स को प्रकाशित या प्रकाशित किए जाने से रोका जाए, जिन्हें अडानी ने कथित मानहानिपूर्ण (defamatory) बताया था।
— इसमें आदेश था कि कुछ पहले से मौजूद लेख, वीडियो या पोस्ट्स जो अडानी से जुड़े हैं, उन्हें हटाया जाए।
— यह आदेश बिना पत्रकारों को सुनने के (defendants को notice दिए बिना) पास किया गया था।
2. कौन-कौन शामिल हैं
— पत्रकार: रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, आयुषकांत दास, आयुष जोशी
— परंजॉय गुहा ठाकुरता भी इस मामले में शामिल हैं, उनके खिलाफ भी समान प्रकार की चुनौती है।
— अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने दावा किया है कि इन रिपोर्टों / पोस्ट्स से उनकी प्रतिष्ठा को भारी क्षति हुई है और उनका ब्रांड वैल्यू गिरा है।
3. क्या हुआ सुनवाई में
— पत्रकारों ने अदालत में यह तर्क दिया कि अधिकांश सामग्री (articles/posts) जून 2024 से पहले से सार्वजनिक डोमेन (public domain) में थी; मतलब कि वह सामग्री जो हटाने का आदेश लिया गया, वह नयी या अचानक प्रकाशित नहीं हुई थी।
— उन्होंने कहा कि एक ex parte आदेश देना, बिना यह जानने कि सामग्री वास्तव में मानहानिपूर्ण है या नहीं, प्रेस की स्वतंत्रता पर गलत असर डालता है।
— अदालत ने पूछा कि किस प्रकार से plaintiff (अडानी) ने यह साबित किया कि कौन-सी सामग्री मानहानिपूर्ण है, क्या नुकसान हुआ है, आदि।
4. न्यायालय का निर्णय
— 18 सितंबर 2025 को रोहिणी की एक दूसरी अदालत (District Judge Ashish Aggarwal) ने चार पत्रकारों (रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, आयुषकांत दास, आयुष जोशी) की अपील स्वीकार कर 6 सितंबर के गैग ऑर्डर को खारिज कर दिया।
— न्यायालय ने कहा कि ex parte आदेश को टिकाऊ नहीं माना जा सकता क्योंकि defendants (पत्रकारों) को सुनने का अवसर नहीं दिया गया था।
— न्यायालय ने यह भी नोट किया कि यदि बाद में यह पाया गया कि सामग्री मानहानिपूर्ण नहीं है, तो हटाई गई सामग्री को फिर से बहाल करना संभव नहीं होगा।
— हालांकि, परंजॉय गुहा ठाकुरता की अपील पर अभी भी फैसला सुरक्षित रखा गया है।
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क्या महत्वपूर्ण तर्क उभरे हैं / मुद्दे
प्रेस की स्वतंत्रता (Freedom of Press / Speech): पत्रकारों की ओर से कहा गया कि इस तरह के व्यापक रूप से प्रकाशित लेखों को बंद करना या हटवाना, विशेष रूप से जब वे सार्वजनिक डोमेन में हों, प्रेस की आज़ादी पर हमला है।
न्यायिक प्रक्रिया (Due Process / Hearing): न्यायालय ने यह माना कि defendants को सुनना आवश्यक है क्योंकि ex parte आदेश से उन्हें अपनी दलीलों का मौका नहीं मिला।
अस्थायी (Interim) और ज़रूरी प्रकृति: क्या स्थिति इतनी तात्कालिक थी कि ex parte आदेश देना आवश्यक हो? पत्रकारों का तर्क है कि नहीं, क्योंकि सामग्री पुरानी है।
मानहानि का प्रामाणिक होना: अदालत ने पूछा कि वास्तव में क्या सामग्री गलत है, कितना झूठ है, कौन‐सी बातें साबित हो सकती हैं — ये स्पष्ट होना चाहिए जब मानहानि का दावा किया जाता है।
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क्या असर पड़ेगा / आगे क्या हो सकता है
उन चार पत्रकारों के लिए तो राहत हुई कि उनके खिलाफ लगे इस तरह के आदेश को हटाया गया है।
लेकिन परंजॉय गुहा ठाकुरता की अपील अभी लंबित है; उसका फैसला आना बाकी है।
यह मामला प्रेस-स्वतंत्रता, prior restraint (पूर्व प्रतिबंधों) और न्यायिक व्यवस्था में सुनवाई के अधिकार (right to be heard) के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण बहस खड़ी कर रहा है।
सरकार / सूचना मंत्रालय / प्लेटफार्मों पर भी दबाव बढ़ेगा कि कोर्ट के आदेशों को ज़रूरत और प्रक्रिया के अनुरूप बनाया जाएँ, ताकि ऐसे व्यापक निर्देशों से गलत उपयोग नहीं हो।
दिल्ली कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ पत्रकारों के लिए राहत भरा है, बल्कि मीडिया स्वतंत्रता के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे यह संकेत गया है कि बड़े कॉरपोरेट हाउस भी एकतरफा आदेश लेकर आलोचनात्मक रिपोर्टों को दबा नहीं सकते।

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