लेखक : हर प्रसाद माथुर , श्री चित्रगुप्त हरी धाम संस्था पुष्कर अजमेर राजस्थान
दोहा
हाथ जोड़ विनती करूं,
हे चित्रगुप्त भगवान।
हृदय आकर आप विराजो, पूर्ण हो मेरे सब काज।
सुमिरन कर इच्छा फल पाऊं, पाप कर्मों का हो नाश।
सरस्वती जीभा विराजे, दो ज्ञान का भंडार ।।
ओम श्री चित्र गुप्ताय नमः
ब्रह्मा जी ने जब ध्यान लगाया ,प्रकट हुए शामल रूप भगवान।
चित्त से अवतार लिया इसलिए ,ब्रह्मा जी ने नाम रखा चित्रगुप्त भगवान।
शांत मधुर तन सुंदर रूपा, सोहे कलम दवात सुंदर बदन विशाला।
चारी भुजा तन श्याम विराजे, माथे रतन मुकुट छवि साजे।
कुंडल श्रवण चमाचम चमके ,गले विच मोतियन माला दमके।
ज्ञान के भंडार हो तुम देवा, त्रिलोकी के मुख्य न्यायाधीश कहलाते ।
जयति जयति श्री चित्रगुप्त भगवाना, करहूं कृपा हे अंतर्यामी ।
तेज रस अतुलित बल धारी, जग तारण की महिमा तुम्हारी ।
रामचंद्र जी के राज तिलक में, भूल गए जब गुरु ऋषि राज ।
दवात कलम छोड़ दी आपने, मच गया सृष्टि में आहाकार ।
नरक से निकलने लगे सब प्राणी ,पहुंचने लगे स्वर्ग के द्वार।
ध्यान कियो जब राम गुरु ने, पछताने लगे अपनी गलती मान।
आठ प्रहर के भीतर -भीतर, दिखाई नाथ ने अद्भुत लीला।
चिंतित हो पहुंचे द्वारा आपके ,गुरु वशिष्ठ संग राम भगवाना।
हाथ जोड़ विनती करी ,जब गुरु और प्रभु श्री राम ने ।
हे करुणा निधान -दया के सागर ,हे न्याय के अधिकारी।
जय जय जय हे ब्रह्मा अवतारी, दुष्ट दलन अरु स्वर्ग नरक दातारी ।
भूल हो गई हमसे भारी ,क्षमा करो हे जगत पिता के मानस युग अवतारी।
गुरु परमेश्वर की विनती सुन, तुमने पुन्हें कलम दवात उठाई है ।
जहां पहुंचे मुनि वशिष्ठ सन्ग श्री राम ,वह जगह कहलाती अयोध्या में श्री हरि धाम।
रावण ने साधु वेश् धर, किया माता सीता का हरण।
धर्मराज बैठे हनुमान के घट में ,और करा दिया लंका दहन ।
पासा फैके राजा शगुनी, जुआ खेलै कौरव पांडव संग।
।दुर्योधन ने धोखा किया, दुशासन ने किया द्रोपदी का चीर हरण ।
चित्रगुप्त क्रोधित हुए और, नटवर नागर से महाभारत रचवाई है ।
पांचो पांडव हुए भक्त आपके , किया धर्म का प्रचार ।
इसलिए धर्मराज कहलाये, युधिष्ठिर भीम अर्जुन महान।
भक्ति देख पिता मह भीष्म की, दिया आपने इच्छा मृत्यु वरदान ।
बाण लाग्यो लक्ष्मण के तब, मूर्छित हुए वह तत्काल ।
वैद्य सुषैन के रूप में आय, आप बचाओ लक्ष्मण के प्राण ।
जय हो प्रभु चित्रगुप्त कृपाला ,दया करो संतन प्रतिपाला।
परमपिता ब्रह्मा ने लिया निर्णय , विश्व शांति यज्ञ करने का।
पुष्प फैक चयन किया भूमि का, वह स्थान तीर्थ गुरु पुष्कर कहलाया ।
विश्व की एकमात्र ब्रह्मा नगरी, जहां सृष्टि रचयिता है विराजमान।
जगत पिता ब्रह्मा को शीश नवाए, जो चित्रगुप्त हरि दर्शन पावे है।
मनोरथ पूर्ण होते उसके, तीर्थ ब्रह्मा दर्शन लाभ होता उसको ।
जय जय जय श्री चित्रगुप्त अविनाशी ,जन जन के हो तुम घट वासी ।
सहयोगी है तुम्हारा सृष्टि में, शनि सन्ग वीर यमराजा।
जा को बल त्रिलोकी पुर् जाना, दृष्टि से कोई बच नहीं पाया।
कर्म न्याय फल लेखक हो तुम, रखते हर प्राणी का ध्यान।
तुम हो भक्तों के हितकारी, सुन ली जे प्रभु अरज हमारी।
माता-पिता भ्राता सब होई, संकट में पूछे कौऊ नाहीं।
चित्त चित्त चित्त से जो कोई धयावे, परम प्रतापी पुत्रन सो पावै।
पाहिमाम पाहिमाम पाहिमाम नाथ में पुकारू, विश्व कल्याणक नाथ मोहे आन उबारो।
पूजै जो तुम्हें नर नारी, कष्ट मिटे कटे सब पीड़ा भारी।
हरी प्रसाद करें या विनती, पूर्ण करो मनोरथ सब काज।
जन्म जन्म के पाप नसावै, अंत ब्रह्मा अवतारी चित्रगुप्त धाम को पावै।
जो जन प्रातः काल को, पाठ करें ध्यान लगाय।
हाथ जोड़ विनती करें और, देवै कलम दवात का दान।
चित्रगुप्त हरि कृपा से, सकल सिद्ध हो सब काज।
भूल चूक कर जो माफ़,
श्री चित्रगुप्त पाहिमाम पाहिमाम पाहिमाम।
