पूर्व न्यायाधीशों, सूचना अधिकार विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने कहा—RTI व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
रीवा, मध्य प्रदेश। सूचना के अधिकार (RTI) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर 26 जुलाई 2026 को आयोजित 318वीं RTI बैठक में देशभर के कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने गंभीर चिंता जताई। बैठक में आरटीआई आवेदकों को मिल रही धमकियों, हमलों, प्रशासनिक स्तर पर सूचना में देरी और सूचना आयोगों में लंबित मामलों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि RTI कानून लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को शासन के कामकाज की जानकारी उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में यदि सूचना मांगने वाले नागरिकों को डर, दबाव या हिंसा का सामना करना पड़े अथवा सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हो, तो इससे कानून की मूल भावना प्रभावित होती है।

RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती
RTI रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने आरटीआई कार्यकर्ताओं के सामने आने वाली चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार, भूमि विवाद और प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़ी जानकारी सामने लाने वाले कई कार्यकर्ताओं को धमकी, उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने व्हिसलब्लोअर और RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी और संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले नागरिकों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
पूर्व न्यायाधीशों ने सुरक्षा तंत्र मजबूत करने पर दिया जोर
बैठक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति सुधीर सक्सेना और राजीव लोचन मेहरोत्रा ने भी विचार रखे। उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्हिसलब्लोअर और RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के उपायों को प्रभावी बनाने की आवश्यकता बताई।
चर्चा के दौरान यह सुझाव भी सामने आया कि संबंधित कानूनों और मौजूदा कानूनी प्रावधानों की समीक्षा कर ऐसे सुधार किए जाएं, जिससे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने वाले नागरिकों को संस्थागत संरक्षण मिल सके।
RTI कानून की भावना कमजोर होने पर चिंता
बैठक में प्रतिभागियों ने आरोप लगाया कि कई मामलों में सार्वजनिक अधिकारियों के वित्तीय लेन-देन, नियुक्तियों और प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित सूचनाएं उपलब्ध कराने में अनावश्यक देरी की जाती है या आवेदनों को विभिन्न आधारों पर खारिज कर दिया जाता है।
वक्ताओं ने कहा कि यदि वैध RTI आवेदनों का समय पर निस्तारण नहीं होता और अपीलों पर वर्षों तक निर्णय नहीं आता, तो सूचना का अधिकार अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगा। उन्होंने सूचना आयोगों में लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था की मांग उठाई।
वर्षों से लंबित मामलों के लिए तय हो समय-सीमा
पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने RTI मामलों के निस्तारण के लिए एक स्पष्ट और संरचित समय-सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि साधारण RTI मामलों और अपीलों के लिए प्रभावी कैलेंडर बनाया जाना चाहिए, ताकि वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों का समयबद्ध समाधान हो सके।
बैठक में यह भी कहा गया कि सूचना आयोगों में लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए संस्थागत क्षमता बढ़ाने, डिजिटल व्यवस्था को बेहतर बनाने और प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
जटिल मामलों के लिए तेज प्रक्रिया की मांग
पूर्व न्यायमूर्तियों ने न्यायिक और प्रशासनिक संस्थानों की कार्यक्षमता बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि जटिल और विशेष प्रकृति के मामलों के लिए प्रभावी प्रक्रिया विकसित की जानी चाहिए। साइबर अपराध और अन्य तकनीकी मामलों में विशेषज्ञता आधारित कार्यप्रणाली अपनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
RTI आवेदन कैसे करें, विशेषज्ञ ने दी व्यावहारिक सलाह
RTI रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने आवेदकों को सलाह दी कि सूचना मांगते समय आवेदन को स्पष्ट और विशिष्ट रखा जाए। उन्होंने कहा कि आवेदक अधिकारियों से “क्यों” या “कैसे” जैसे व्यापक सवाल पूछने के बजाय उपलब्ध अभिलेखों, आदेशों, पट्टों और अन्य दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगें।
उनके अनुसार, RTI आवेदन में मांगी जाने वाली सूचना को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने से आवेदन के प्रभावी निस्तारण की संभावना बढ़ती है।
कानूनी मामलों पर भी हुआ मार्गदर्शन
बैठक में पारिवारिक और भरण-पोषण से जुड़े मामलों पर भी कानूनी चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने बताया कि ऐसे मामलों में संबंधित न्यायालयों के समक्ष स्थगन और शीघ्र सुनवाई जैसे आवेदन प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तुत किए जा सकते हैं। संपत्ति अधिकार और भरण-पोषण से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए उचित न्यायिक उपाय अपनाने पर जोर दिया गया।
इसके अलावा विभिन्न राज्य सूचना आयोगों के ऑनलाइन पोर्टल में आ रही तकनीकी समस्याओं, आवेदन की स्थिति ट्रैक करने में हो रही परेशानियों और डिजिटल व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाने की जरूरत पर भी चर्चा हुई।
सामूहिक प्रयास से ही मजबूत होगी पारदर्शिता
बैठक के समापन पर वक्ताओं ने कहा कि सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, बल्कि नागरिकों को शासन से सवाल पूछने और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक माध्यम है। इसे प्रभावी बनाए रखने के लिए सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन, सूचना आयोगों और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा।
बैठक में कहा गया कि देश में नागरिक और युवा स्तर पर बढ़ती जागरूकता यह संकेत देती है कि जनता शासन व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है। ऐसे में RTI व्यवस्था को कमजोर करने के बजाय उसे अधिक प्रभावी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
ये लोग रहे मौजूद
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक RTI कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया। छत्तीसगढ़ से RTI एक्टिविस्ट देवेंद्र अग्रवाल ने भी कार्यक्रम के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में राज तिवारी, पारवानी, नरेश सैनी, शुभम सोनी, जयपाल सिंह खींची और फतेह चंद्र गुलेरिया सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अनेक प्रतिभागी उपस्थित रहे।
स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट | रीवा, मध्य प्रदेश
