बेरोजगार खिलाड़ियों का हक कौन खा रहा है?
खेल विभाग बना रोजगार बांटने का अड्डा?
भाजपा नेता ने खोली नियुक्तियों की कथित पोल
अजमेर। राजस्थान में खेल प्रतिभाओं को तराशने और खिलाड़ियों को अवसर देने की जिम्मेदारी जिस विभाग पर है, उसी खेल विभाग की नियुक्तियां अब गंभीर सवालों के घेरे में हैं। सवाल यह है कि क्या राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद में पार्ट-टाइम कोच की नियुक्तियां वास्तव में योग्य और बेरोजगार खिलाड़ियों के लिए हो रही हैं, या फिर यह व्यवस्था कुछ चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने का माध्यम बन चुकी है?
भाजपा खेलकूद प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश मीडिया प्रभारी शिवदत्त पाराशर ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में जो आरोप लगाए हैं, वे यदि सही साबित होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि बेरोजगार खिलाड़ियों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल उस शपथ पत्र पर खड़ा होता है जो नियुक्ति से पहले अभ्यर्थी से लिया जाता है। स्टाम्प पेपर पर नोटरी करवाकर अभ्यर्थी यह घोषणा करता है कि वह बेरोजगार है। लेकिन यदि नियुक्ति पाने वाले कई लोग पहले से निजी स्कूलों, कॉलेजों और संस्थानों में नौकरी कर रहे हैं तथा मोटा वेतन भी ले रहे हैं, तो फिर यह शपथ पत्र किस काम का है? क्या यह केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है?
इससे भी बड़ा प्रश्न जिला खेल अधिकारियों की भूमिका पर उठता है। क्या नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों के दावों की जांच की गई? क्या यह सत्यापित किया गया कि वे वास्तव में बेरोजगार हैं? यदि नहीं, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
आरोप यह भी है कि जिन युवाओं ने वर्षों तक मैदान में पसीना बहाया, पदक जीते और रोजगार की उम्मीद में बैठे हैं, उनके हिस्से के अवसर उन लोगों को दिए जा रहे हैं जो पहले से कहीं न कहीं रोजगार प्राप्त कर चुके हैं। यदि ऐसा है तो यह खेल प्रतिभाओं के साथ खुला अन्याय है।
मामला यहीं नहीं रुकता। आरोपों के अनुसार, खेल परिषद से सेवानिवृत्त होकर पेंशन प्राप्त कर रहे कुछ लोगों को भी पुनः नियुक्तियां दी जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब हजारों युवा रोजगार की प्रतीक्षा में हैं तो बार-बार उन्हीं लोगों को अवसर क्यों दिए जा रहे हैं जिनकी आर्थिक सुरक्षा पहले से सुनिश्चित है?
खेल विभाग का उद्देश्य खिलाड़ियों को मंच देना है, लेकिन यदि नियुक्तियों में पारदर्शिता की जगह प्रभाव, पहुंच और कागजी खेल हावी हो जाएं तो फिर विभाग और दलाल तंत्र में फर्क क्या रह जाता है?
मुख्यमंत्री से मांग की गई है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, नियुक्त अभ्यर्थियों की रोजगार स्थिति का सत्यापन किया जाए और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं एजेंसियों पर कार्रवाई हो।
अब सवाल केवल कुछ नियुक्तियों का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जिस पर हजारों बेरोजगार खिलाड़ियों का भविष्य टिका हुआ है। सरकार को तय करना होगा कि खेल विभाग खिलाड़ियों का मंच बनेगा या फिर कथित रूप से रोजगार बांटने का अड्डा।
खबर वन न्यूज का सवाल:
क्या राजस्थान के बेरोजगार खिलाड़ियों का हक छीना जा रहा है?
क्या शपथ पत्र सिर्फ दिखावा है?
और क्या खेल विभाग में चल रहे इस कथित खेल की निष्पक्ष जांच होगी?
इन सवालों के जवाब अब सरकार और खेल विभाग को देने होंगे।
