जयपुर/आहोर। राजस्थान के समग्र शिक्षा कार्यालय, आहोर से जुड़ा एक आधिकारिक प्रतीत होने वाला दस्तावेज़ सामने आने के बाद शिक्षा विभाग में अंदरूनी भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अधिवक्ता गौरधन सिंह ने यह दस्तावेज़ अपने फेसबुक पेज पर साझा करते हुए सरकार और प्रशासन से जवाब मांगा है।

दस्तावेज़ में 15×12 साइज की दरी की आपूर्ति के लिए ₹14,310 की “अनुमोदित दर (उद्योग एवं वाणिज्य विभाग द्वारा)” अंकित है। सवाल यह नहीं है कि दर लिखी है, सवाल यह है कि यह दर किस आधार पर, किस प्रक्रिया से और किसकी सहमति से तय की गई?
दस्तावेज़ पर कार्यालय प्रमुख, क्रमांक, दिनांक और हस्ताक्षर स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। ऐसे में यह मानना कठिन है कि इस प्रकार का आदेश बिना ऊपर तक फाइल चले, बिना जिम्मेदार अधिकारियों के हस्ताक्षर के जारी हो सकता है। यही कारण है कि यह मामला केवल एक ब्लॉक या कार्यालय तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि पूरे विभागीय तंत्र की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
क्या इस दरी की आपूर्ति के लिए कोई खुली टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई?
क्या बाजार दरों से तुलना कर यह दर तय की गई?
क्या दरी की गुणवत्ता, सामग्री, मोटाई, ब्रांड और जीएसटी जैसे बिंदुओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया?
यदि इन सभी सवालों का जवाब ‘नहीं’ है, तो यह सीधे तौर पर सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका को मजबूत करता है।
सबसे गंभीर सवाल यह भी है कि यदि यह दर उद्योग एवं वाणिज्य विभाग द्वारा अनुमोदित है, तो उसका मूल आदेश, दर-सूची और अधिसूचना सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? जब जनता के टैक्स का पैसा खर्च हो रहा है, तो गोपनीयता किस बात की?
सरकार को ऐसे मामलों में केवल विभागीय खानापूर्ति जांच नहीं, बल्कि स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच करवानी चाहिए जो मिसाल बने इन शिक्षा के मंदिर में बैठे भ्रष्टाचारियों के लिए और इन पर लगाम लगे। इसमें संबंधित फाइल मूवमेंट, अनुमोदन प्रक्रिया, भुगतान रिकॉर्ड, आपूर्तिकर्ता विवरण और ऑडिट रिपोर्ट की गहन जांच होनी चाहिए।
सरकार मामले की जांच करवाए
✔ संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कराए
✔ दोषी पाए जाने पर सख्त विभागीय व कानूनी कार्रवाई करे
✔ और सभी दस्तावेज़ सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित करे।
अधिवक्ता गौरधन सिंह द्वारा साझा किया गया यह मामला केवल एक दरी की कीमत पर सवाल नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की परतें खोलता है, जहां बिना जवाबदेही के फैसले लिए जाते हैं। अब देखना यह है कि सरकार इसे एक साधारण विवाद मानकर टालती है, या फिर इसे राजस्थान में बड़े भ्रष्टाचार के खुलासे के रूप में लेकर कठोर कार्रवाई करती है।
जनता को अपनी चुनी हुई सरकार का भ्रष्टाचार के खिलाफ मामलों में उसकी टॉलरेंस पावर को परखने का मौका मिलेगा ।
