संपादकीय: देवेंद्र सक्सैना
राजस्थान और देश की पत्रकारिता ने एक ऐसी आवाज़ खो दी है जिसने लगभग चार दशकों तक सच को निर्भीकता से सामने रखा। वरिष्ठ पत्रकार, शिक्षक और राजस्थान के पूर्व सूचना आयुक्त का निधन पत्रकारिता जगत के लिए एक गहरी क्षति है। उनका जीवन केवल एक पत्रकार की कहानी नहीं बल्कि लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी और जनपक्षधरता की एक प्रेरक यात्रा है।
नारायण बारेठ का जन्म 1 अक्टूबर 1957 को राजस्थान में हुआ। साधारण परिवार में जन्मे बारेठ ने शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन की दिशा तय की। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर और विधि की पढ़ाई की। छात्र जीवन से ही सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को समझने की गहरी रुचि उनके भीतर थी। यही रुचि आगे चलकर उन्हें पत्रकारिता की ओर ले गई।
1980 के दशक के मध्य में उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने राजस्थान के क्षेत्रीय मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की और जल्द ही अपनी स्पष्ट, तथ्यपरक और निर्भीक लेखनी के कारण पहचान बना ली। उनकी रिपोर्टिंग में सत्ता के दबाव से मुक्त दृष्टिकोण और समाज के अंतिम व्यक्ति की चिंता स्पष्ट दिखाई देती थी। यही कारण था कि वे जल्द ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से जुड़े।
नारायण बारेठ लंबे समय तक के राजस्थान संवाददाता रहे। उस समय उनकी रिपोर्टिंग ने राजस्थान की राजनीति, समाज और सीमावर्ती क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। इसके अलावा उन्होंने , , और जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ भी काम किया।
उनकी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने केवल राजनीतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं की बल्कि समाज के उन वर्गों की आवाज़ भी बने जो अक्सर खबरों के केंद्र में नहीं होते। राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में पानी और सूखे की समस्या, भारत-पाक सीमा से जुड़े मानवीय मुद्दे, पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की स्थिति, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों की चुनौतियाँ—इन सभी विषयों पर उनकी रिपोर्टिंग गहराई और संवेदनशीलता के साथ सामने आई।
पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे तथा राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में प्रोफेसर रहे। उन्होंने सैकड़ों युवा पत्रकारों को पत्रकारिता के मूल सिद्धांत—सत्य, निष्पक्षता और जनहित—की शिक्षा दी।
पत्रकारिता में लंबे अनुभव और जनविश्वास के कारण उन्हें सार्वजनिक दायित्व निभाने का अवसर भी मिला। वर्ष 2020 में उन्हें में राज्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने सूचना के अधिकार को मजबूत बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण फैसले दिए। अपने लगभग दो वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने हजारों आरटीआई मामलों का निस्तारण किया और कई मामलों में सरकारी विभागों को स्पष्ट संदेश दिया कि सूचना छिपाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। उनके आदेशों ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूती दी।
व्यक्तिगत अनुभव:- बारेठ साहब जब राज्य सूचना आयुक्त के पद पर थे तब उन्होंने मेरी एक नगर निगम ,अजमेर की अपील जो कि निगम के द्वारा एक ही कार्य के दो टेंडरों का भुगतान कर देने पर कार्यों के निरीक्षण करने के लिए लगाई गई थी । जिस पर बारेठ साहब ने राजस्थान में पहली बार निगम के कार्यों का वीडियो ग्राफी के साथ निरीक्षण करवाने के आदेश दिए,जिसे मेरे द्वारा करवाया गया । देवेंद्र सक्सैना,अजमेर ।
नारायण बारेठ केवल एक पेशेवर पत्रकार नहीं थे, बल्कि वे एक संवेदनशील और विनम्र व्यक्तित्व के रूप में भी जाने जाते थे। यही कारण था कि राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद लगभग सभी दलों के नेता और समाज के विभिन्न वर्ग उनका सम्मान करते थे। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री सहित अनेक सार्वजनिक हस्तियों ने उनके निधन को पत्रकारिता जगत की अपूरणीय क्षति बताया।
मार्च 2026 में बीमारी के कारण उनका निधन हो गया और इसके साथ ही राजस्थान की पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया। लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है—उनकी रिपोर्टिंग में, उनके विद्यार्थियों में और उस पत्रकारिता की परंपरा में जो सत्ता से सवाल करने का साहस रखती है।
नारायण बारेठ की जीवन यात्रा यह साबित करती है कि पत्रकारिता का असली उद्देश्य केवल खबर देना नहीं बल्कि समाज को सच से परिचित कराना और लोकतंत्र को मजबूत बनाना है। यही कारण है कि उनका नाम राजस्थान की पत्रकारिता के इतिहास में एक ऐसे पत्रकार के रूप में दर्ज रहेगा जिसने अपनी कलम को हमेशा जनहित के लिए समर्पित रखा।

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