बिहार। सरकार ने भूमि विवादों पर लगाम कसने की दिशा में बड़ा और दूरगामी फैसला किया है। अब जमीन की असली पहचान 1890 से 1920 के बीच हुए कैडस्ट्रल सर्वे रिकॉर्ड के आधार पर तय की जाएगी। यदि उस समय किसी जमीन को ‘सरकारी’, ‘सैरात’ या ‘गैरमजरुआ’ के रूप में दर्ज किया गया है, तो आज भी उसका वही मूल स्वरूप माना जाएगा। बाद के वर्षों में हुए रिविजनल सर्वे या खतौनी में नाम दर्ज हो जाना अपने-आप में मालिकाना हक़ नहीं माना जाएगा।
सरकार का कहना है कि कई जिलों में रिविजनल सर्वे के दौरान गंभीर लापरवाही हुई, जिसमें सरकारी जमीनें गलती से निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज हो गईं। अब ऐसे मामलों में रिकॉर्ड सुधार की कार्रवाई की जाएगी और जमीन का मूल स्वभाव बदला नहीं जाएगा। जिन लोगों के पास सरकार द्वारा जारी कोई वैध बंदोबस्ती या सेटलमेंट आदेश नहीं है, उन्हें जमीन छोड़नी पड़ सकती है।
इस नीति का सीधा असर उन मामलों पर पड़ेगा, जहां केवल खतौनी, रजिस्ट्री या लंबे कब्जे के आधार पर सरकारी जमीन पर दावा किया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल नाम दर्ज होना या वर्षों से कब्जा होना मालिकाना अधिकार नहीं देता, खासकर जब जमीन मूल रूप से सरकारी हो।
पाठकों के लिए यह जानना जरूरी है कि अब भूमि से जुड़े किसी भी दावे में सबसे पहले कैडस्ट्रल सर्वे का रिकॉर्ड देखा जाएगा। इसके साथ रिविजनल सर्वे, नक्शा मिलान और बंदोबस्ती आदेश की जांच होगी। जिन क्षेत्रों में विशेष भूमि सर्वे या रिकॉर्ड सत्यापन अभियान चल रहा है, वहां नोटिस को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के मामलों में अब सरकार की स्थिति और मजबूत होगी। अदालतें पहले भी यह मान चुकी हैं कि राजस्व रिकॉर्ड में हुई गलती से मालिकाना हक़ पैदा नहीं होता। नई नीति से वर्षों से लटके भूमि विवादों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है।
सरकार का दावा है कि यह फैसला एक तरफ जहां सरकारी जमीनों को बचाने में मदद करेगा, वहीं दूसरी ओर वास्तविक और वैध जमीन मालिकों को भी सुरक्षा देगा। साफ संदेश है—अब जमीन का मालिक वही माना जाएगा, जिसके पास सरकारी रिकॉर्ड और आदेश दोनों मौजूद होंगे।
