नई दिल्ली। मध्य -पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच लागू हुआ दो हफ्तों का अस्थायी सीजफायर फिलहाल राहत की खबर जरूर देता है, लेकिन हालात अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। इस युद्धविराम के साथ ही ईरान ने शांति वार्ता के लिए 10 बिंदुओं का प्रस्ताव पेश किया है, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। खासकर यह बात तेजी से फैलाई जा रही है कि अमेरिका ने ईरान की सभी शर्तें मान ली हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग है और अभी तक ऐसा कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है।
ईरान की इन शर्तों में प्रमुख रूप से अमेरिका द्वारा सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने, मध्य-पूर्व से अमेरिकी सेना की वापसी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई और विदेशों में जमी संपत्ति को वापस करने की मांग शामिल है। इसके अलावा ईरान ने भविष्य में किसी भी सैन्य कार्रवाई को रोकने की गारंटी, क्षेत्रीय संघर्षों को समाप्त करने, सुरक्षित समुद्री आवाजाही की व्यवस्था, अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के अधिकार और संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में समझौते को बाध्यकारी बनाने की शर्तें भी रखी हैं।
हालांकि अमेरिका ने इन शर्तों को केवल बातचीत का आधार माना है और कई मांगों को सख्त व जटिल बताया है। यही वजह है कि सीजफायर को स्थायी समाधान नहीं बल्कि एक अस्थायी कदम माना जा रहा है। इस दौरान कुछ क्षेत्रों में तनाव और छिटपुट घटनाओं की खबरें भी सामने आई हैं, जो इस समझौते की नाजुक स्थिति को दर्शाती हैं।


विशेषज्ञों के अनुसार यह सीजफायर दोनों देशों को बातचीत के लिए अवसर देता है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दे अभी भी बड़े विवाद बने हुए हैं। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि शांति स्थापित हो गई है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ईरान की 10 शर्तें केवल प्रस्ताव हैं और उन पर अंतिम निर्णय होना बाकी है।

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