अजमेर । सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने वाला फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र प्रकरण अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। इस मामले में रिटायर्ड चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिलीप कुमार वैष्णव को लेकर विभागीय व जांच एजेंसियों की पड़ताल तेज हो गई है। आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से नियमों के विपरीत तैयार कराए गए दिव्यांग प्रमाण-पत्र के आधार पर सरकारी सेवा में नियुक्ति से लेकर सेवा लाभ और सेवानिवृत्ति सुविधाओं तक का लाभ उठाया।
जांच के दौरान उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों और सरकारी अभिलेखों के मिलान में कई गंभीर विसंगतियाँ सामने आई हैं। प्रमाण-पत्र में दर्ज दिव्यांगता की श्रेणी, प्रतिशत और मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रही, जिससे प्रमाण-पत्र की वैधता पर संदेह गहराया है। इसी आधार पर मामला उच्च स्तर पर भेजते हुए विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं।
सूत्रों के अनुसार, यह जांच अब केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रमाण-पत्र जारी करने वाले मेडिकल बोर्ड, सत्यापन करने वाले विभागीय कर्मचारियों और उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई जा रही है। यदि फर्जीवाड़े की पुष्टि होती है तो सरकारी लाभों की रिकवरी, पेंशन व अन्य सेवानिवृत्ति लाभों पर पुनर्विचार तथा आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाने की कार्रवाई संभव है।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वास्तविक दिव्यांगों के अधिकारों से समझौता करने वालों के प्रति सरकार किसी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगी। यह मामला न केवल एक व्यक्ति की कथित अनियमितता का है, बल्कि उस सिस्टम की भी परीक्षा है, जिसके भरोसे पात्र लोगों को उनका हक मिलता है। जांच पूरी होने के बाद इसके नतीजे और भी गंभीर खुलासे कर सकते हैं।
नोट: यह खबर विभागीय सूत्रों व उपलब्ध दस्तावेज़ों पर आधारित है। जांच पूर्ण होने तक सभी आरोप कथित हैं।
