राजस्थान में डॉक्टरों को सौंपी गई आवारा कुत्तों की निगरानी की जिम्मेदारी, आदेश बना चर्चा का विषय
जयपुर । (मीडिया) राजस्थान के कुछ सरकारी अस्पतालों में जारी प्रशासनिक आदेश इन दिनों चर्चा में है, जिसमें अस्पताल परिसरों में बढ़ती आवारा कुत्तों की समस्या को देखते हुए डॉक्टरों को नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस आदेश का उद्देश्य अस्पताल परिसर में मरीजों, परिजनों और स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि सोशल मीडिया पर इसे इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानो डॉक्टरों को सीधे तौर पर “कुत्ते भगाने” का काम सौंप दिया गया हो, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
प्रशासन की ओर से जारी आदेश के अनुसार, डॉक्टरों को आवारा कुत्तों को स्वयं भगाने के लिए नहीं कहा गया है, बल्कि उन्हें संबंधित नगर निकाय, पशुपालन विभाग और अन्य जिम्मेदार एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करने का दायित्व दिया गया है। नोडल अधिकारी के रूप में डॉक्टर यह सुनिश्चित करेंगे कि अस्पताल परिसर में कुत्तों का प्रवेश न हो, समय पर शिकायत दर्ज हो और समाधान की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़े।
बताया जा रहा है कि यह कदम अस्पतालों में डॉग-बाइट की घटनाओं और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्देशों के बाद संवेदनशील स्थानों जैसे अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में आवारा जानवरों के नियंत्रण को लेकर प्रशासन पर दबाव बढ़ा है। इसी क्रम में यह आदेश जारी किया गया है।
हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल भी उठ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि डॉक्टरों की प्राथमिक जिम्मेदारी मरीजों का इलाज है, न कि प्रशासनिक या पशु नियंत्रण से जुड़े कार्य। वहीं प्रशासन का तर्क है कि यह केवल समन्वय की भूमिका है, जिससे व्यवस्था बेहतर हो सके।
स्पष्ट है कि यह कोई नया कानून नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर जारी एक प्रशासनिक व्यवस्था है, जिसका मकसद अस्पताल परिसरों को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाना है। इसके बावजूद शब्दों और प्रस्तुति के कारण यह आदेश जनता के बीच बहस का विषय बन गया है।
