25 जून: केवल इतिहास नहीं, लोकतंत्र का आईना

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संपादकीय – देवेन्द्र सक्सैना

25 जून 1975 से 25 जून 2026 तक : क्या हमने इतिहास से सबक सीखा

25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तारीख है जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। इसी दिन देश में आपातकाल लागू हुआ। प्रेस पर सेंसरशिप लगी, विपक्षी नेताओं को जेलों में डाला गया, नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए और सत्ता के विरोध को नियंत्रित करने का प्रयास हुआ। यह वह दौर था जिसने देश को यह एहसास कराया कि लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों में लिखे शब्दों से नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही से जीवित रहता है।

आज, 51 वर्ष बाद जब हम उस कालखंड को याद करते हैं, तब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उस समय क्या हुआ था, बल्कि यह है कि क्या हमने उससे कोई सबक सीखा?

देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी युवा रोजगार की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। किसान अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। कर्मचारी अपने अधिकारों की आवाज बुलंद कर रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप लगने पर अभ्यर्थी धरना दे रहे हैं। स्थानीय स्तर पर भी नागरिक पानी, बिजली, सड़क, पर्यावरण और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

यह सभी घटनाएं किसी लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। लोकतंत्र में जनता का प्रश्न पूछना अपराध नहीं हो सकता। संविधान ने नागरिकों को केवल वोट देने का अधिकार नहीं दिया, बल्कि अपनी बात रखने, विरोध दर्ज करने और सरकार से जवाब मांगने का भी अधिकार दिया है।

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चिंता तब पैदा होती है जब जनता और सरकार के बीच संवाद कमजोर होने लगता है। जब समस्याओं का समाधान बातचीत की मेज पर नहीं होता, तब लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं। कोई भी आंदोलन अचानक पैदा नहीं होता; उसके पीछे लंबे समय तक अनसुनी की गई पीड़ा, अपेक्षाएं और निराशा होती है।

इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या राजनीतिक बहुमत नहीं होती, बल्कि जनता का विश्वास होता है। जब जनता को यह भरोसा होता है कि उसकी बात सुनी जाएगी, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब यह विश्वास कमजोर पड़ता है, तब असंतोष बढ़ता है और सामाजिक दूरी गहरी होती जाती है।

आपातकाल की स्मृति हमें चेतावनी देती है कि लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है—स्वतंत्र मीडिया, निष्पक्ष न्यायपालिका, जवाबदेह प्रशासन, सक्रिय विपक्ष और जागरूक नागरिक। इन सभी स्तंभों का मजबूत रहना उतना ही आवश्यक है जितना देश में नियमित चुनाव होना।

आज आवश्यकता किसी एक दल को दोषी ठहराने या किसी एक विचारधारा को श्रेष्ठ साबित करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता में बैठे लोग जनता की आवाज को सुनें, विपक्ष रचनात्मक भूमिका निभाए, मीडिया निर्भीक होकर सच सामने लाए और नागरिक भी अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें।

25 जून हमें केवल अतीत की एक घटना नहीं याद दिलाता, बल्कि यह चेतावनी भी देता है कि लोकतंत्र की रक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है। स्वतंत्रता एक बार प्राप्त कर लेने से हमेशा सुरक्षित नहीं रहती; उसे हर पीढ़ी को अपने विवेक, जागरूकता और साहस से सुरक्षित रखना पड़ता है।

लोकतंत्र तब सबसे मजबूत होता है जब सरकार आलोचना को दुश्मनी नहीं, सुधार का अवसर समझे और जनता विरोध को अराजकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखे।

भारत का संविधान सत्ता को ताकत देता है, लेकिन उससे कहीं अधिक ताकत जनता को देता है। इसलिए 25 जून का सबसे बड़ा संदेश यही है—लोकतंत्र की रक्षा किसी सरकार का नहीं, पूरे राष्ट्र का सामूहिक दायित्व है।

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