आनासागर की लड़ाई: क्या एडीए की जांच समिति सच सामने लाएगी या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा?

Spread the love

अजमेर।आनासागर  लेक व्यू परियोजना को लेकर उठे विवाद के बाद अजमेर विकास प्राधिकरण (एडीए) द्वारा जांच समिति का गठन किया गया है। समिति को एक सप्ताह में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का दायित्व सौंपा गया है। लेकिन इस निर्णय के साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या यह समिति वास्तव में आनासागर और उसके आसपास हुए दशकों के बदलावों, न्यायालयों के आदेशों और जमीनी हकीकत को मात्र 7 दिन में समझते हुए निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार कर पाएगी?

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि समिति में शामिल अधिकारी उसी प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा हैं, जिसके कार्यकाल में वर्षों से आनासागर क्षेत्र में विवादित निर्माण, नालों से छेड़छाड़, जलग्रहण क्षेत्र में हस्तक्षेप, अतिक्रमण और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं। यदि वर्षों से विभागों में बैठे वही अधिकारी और इंजीनियर, जो स्वयं विभिन्न शिकायतों, जांचों और विवादों के दायरे में रहे हैं, समिति को जानकारी उपलब्ध कराएंगे तो क्या रिपोर्ट पूरी तरह निष्पक्ष बना पाएगी समिति कौन बताएगा खामियां ?

अदालतों के आदेशों का क्या होगा?

आनासागर को लेकर वर्षों में अनेक मुकदमे चले हैं। निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक जल निकायों, प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां और आदेश दिए गए हैं। प्रश्न यह है कि क्या समिति के समक्ष इन सभी आदेशों का संकलन प्रस्तुत किया जाएगा? क्या समिति को बताया जाएगा कि आनासागर केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि अजमेर के पर्यावरणीय अस्तित्व का आधार है?

यदि जांच केवल वर्तमान निर्माण और विभागीय अभिलेखों तक सीमित रही तो यह अधूरी होगी। जांच का आधार न्यायालयों के पूर्व आदेश, पुराने मास्टर प्लान, राजस्व अभिलेख, पर्यावरणीय अध्ययन तथा पूर्व में प्रकाशित तथ्यात्मक रिपोर्टें भी होनी चाहिए।

जिनके पास सबसे अधिक तथ्य हैं, उन्हें क्यों नहीं शामिल किया गया?

आनासागर को लेकर पिछले कई दशकों से स्थानीय समाचार पत्रों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने लगातार मुद्दे उठाए हैं। कई बार प्रशासन और विभागों की कार्रवाई से पहले मीडिया ने तथ्यों को उजागर किया। ऐसे में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि जांच समिति में उन वरिष्ठ संपादकों और पत्रकारों को भी शामिल किया जाए जिन्होंने वर्षों तक आनासागर से जुड़े मामलों का दस्तावेजीकरण किया है।

उनके पास पुराने नक्शे, तस्वीरें, समाचार रिपोर्टें और घटनाक्रम का ऐसा रिकॉर्ड है जो किसी भी सरकारी विभाग से अधिक उपयोगी साबित हो सकता है।

वास्तविक निवासी बनें समिति का हिस्सा

समिति में उन लोगों को शामिल किया जाना चाहिए जिन्होंने वर्षों तक अपने दम पर आनासागर संरक्षण की लड़ाई लड़ी है। ऐसे स्थानीय निवासी, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के जनहित में आवाज उठाई, वे इस जांच के सबसे महत्वपूर्ण पक्षकार हैं।

इसके विपरीत यदि समिति केवल राजनीतिक प्रभाव वाले व्यक्तियों, नामित प्रतिनिधियों या क्षेत्र के प्रभावशाली धनाढ्य वर्ग तक सीमित रही तो जनता के मन में इसकी निष्पक्षता को लेकर संदेह बना रहेगा।

केवल लेक व्यू नहीं, पूरे आनासागर की हो जांच

आज का विवाद केवल एक परियोजना का नहीं है। सवाल पूरे आनासागर क्षेत्र के संरक्षण का है। वर्षों में झील के आसपास हुए निर्माण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों में बदलाव, नालों के चैनलाइजेशन, जलग्रहण क्षेत्र में हस्तक्षेप तथा सरकारी भूमि पर हुए कथित अतिक्रमणों की भी समग्र समीक्षा होनी चाहिए।

यदि जांच केवल वर्तमान विवाद तक सीमित रही तो भविष्य में फिर नए विवाद सामने आएंगे और मूल समस्या जस की तस बनी रहेगी।

जनता के सुझाव

समिति में न्यायिक और पर्यावरण विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।

आनासागर से जुड़े सभी प्रमुख न्यायालयीय आदेश समिति के समक्ष रखे जाएं।

वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया जाए।

वास्तविक स्थानीय निवासियों और जनहित याचिकाकर्ताओं से तथ्य लिए जाएं।

जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और उस पर जन आपत्तियां आमंत्रित की जाएं।

रिपोर्ट के साथ यह भी बताया जाए कि पूर्व आदेशों का कितना पालन हुआ और कितना नहीं।

जनता का सवाल

अजमेर की जनता इस बार केवल एक और समिति नहीं चाहती। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर दशकों से उठ रहे सवालों का उत्तर कौन देगा? यदि जांच का उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना है तो यह समिति भी अनेक पूर्व समितियों की तरह फाइलों में सिमट जाएगी। लेकिन यदि प्रशासन वास्तव में सच सामने लाना चाहता है तो उसे विभागीय दायरों से बाहर निकलकर जनभागीदारी, पारदर्शिता और न्यायालयों के निर्देशों के अनुरूप जांच करनी होगी।

आनासागर अजमेर की धरोहर है। इसकी रक्षा केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जवाबदेही भी है। इसलिए इस बार रिपोर्ट ऐसी बने जो इतिहास दर्ज करे, न कि इतिहास को छिपाए।

अजमेर की माताओं का हाल नेताओं ने साधी chuppi?- खबर वन न्यूज

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *