रिपोर्ट | इलाहाबाद,16 अक्टूबर 2025 फर्रुखाबाद जिले में एक वकील की गिरफ्तारी और धमकाने के आरोपों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिले की पुलिस अधीक्षक आरती सिंह के खिलाफ कड़ा कदम उठाया। अदालत ने एसपी को निर्देश दिया कि जब तक गिरफ्तार वकील को रिहा नहीं किया जाता, वे अदालत कक्ष में उपस्थित रहें।
मामला 8 सितंबर 2025 से शुरू हुआ, जब फर्रुखाबाद पुलिस पर आरोप लगा कि उसने एक व्यक्ति और उसके वकील को अवैध रूप से हिरासत में लिया। वकील पक्ष ने आरोप लगाया कि उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) दायर की थी, जिससे नाराज़ होकर पुलिस ने उन्हें धमकाया और गिरफ्तार कर लिया।
याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने वकील के घर पर तोड़फोड़ की और परिवार को डराया-धमकाया। इस घटना ने अधिवक्ताओं में आक्रोश पैदा कर दिया।
14 सितंबर 2025 को हिरासत में लिए गए व्यक्ति को रिहा किया गया, लेकिन वकील की गिरफ्तारी को लेकर विवाद बढ़ता गया। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा।
14 और 15 अक्टूबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए एसपी आरती सिंह को तलब किया और स्पष्ट निर्देश दिया कि वकील की रिहाई तक वह अदालत में ही उपस्थित रहें।
अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस का यह व्यवहार न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का शासन सर्वोपरि है और कोई भी अधिकारी न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव नहीं डाल सकता।
एस पी आरती सिंह ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर माफी मांगी। उन्होंने कहा कि यह घटना जानबूझकर नहीं हुई और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि माफी तभी स्वीकार होगी जब अदालत यह सुनिश्चित कर ले कि न्यायपालिका की गरिमा बनी रहे।
अदालत ने आदेश सुरक्षित रख लिया और राज्य सरकार से पूरे घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्ट मांगी। साथ ही, न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप पाया गया तो संबंधित अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश पूरे प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र के लिए एक सख्त संदेश माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
> “न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप या वकीलों को डराने की कोशिश सीधे अदालत की अवमानना मानी जाएगी।”
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पूरा सुनें : सौजन्य से बृजभूषण मार्कण्डेय
