पुराने निगम भवन की रात पर कांग्रेस के गंभीर आरोप, धर्मेंद्र गहलोत के पुराने आरोपों ने बढ़ाए सवाल; दूसरी ओर किरण गढ़वाल के नामांकन पर भाजपा की आपत्ति – अब जनता चाहती है हर मामले की निष्पक्ष जांच
अजमेर। अजमेर नगर निगम की राजनीति में महापौर चुनाव के बीच घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। एक ओर कांग्रेस प्रत्याशी किरण गढ़वाल के नामांकन पर भाजपा की आपत्ति को लेकर दिनभर प्रशासनिक कार्रवाई चली और अंततः आपत्ति खारिज कर दी गई। दूसरी ओर पुराने नगर निगम भवन से 16 सितंबर की रात कथित रूप से फाइलें बाहर ले जाने को लेकर कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अब इन दोनों घटनाक्रमों को लेकर अजमेर की जनता का सवाल एक ही है—प्रशासन हर मामले की निष्पक्ष और समान गंभीरता से जांच कब करेगा?
पहला प्रकरण : रात में फाइलें बाहर गईं तो जिम्मेदारी किसकी?
कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया है कि 16 सितंबर की रात करीब 8 से 9:30 बजे पुराने नगर निगम भवन से महत्वपूर्ण फाइलें वाहनों में भरकर बाहर ले जाई गईं। कांग्रेस ने इस मामले में पुराने भवन तथा अभय कमांड सेंटर की संबंधित CCTV फुटेज तत्काल सुरक्षित कराने और पूरे घटनाक्रम की जांच कराने की मांग की है। कांग्रेस की ओर से आपराधिक कार्रवाई की मांग भी सामने आई है।
यहां से मामला राजनीतिक बयान से आगे बढ़कर नगर निगम के रिकॉर्ड की सुरक्षा का बन जाता है।
अजमेर की जनता जानना चाहती है—कितनी फाइलें बाहर गईं? किस विभाग की थीं? किस अधिकारी के आदेश से गईं? किस वाहन से गईं? किसे सौंपी गईं? और आज वे फाइलें कहां हैं?
यदि फाइलें विधिवत स्थानांतरित हुई हैं तो प्रशासन को आदेश और मूवमेंट रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए। यदि ऐसा कोई अधिकृत रिकॉर्ड नहीं है तो मामले की जांच होना स्वाभाविक है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल CCTV का है। क्या 16 सितंबर की रात की फुटेज सुरक्षित कर ली गई? क्या उसकी जांच हुई?
कांग्रेस का आरोप गंभीर है, लेकिन आरोप को अपराध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसकी पुष्टि केवल CCTV, फाइल मूवमेंट रजिस्टर, आदेश-पत्र और संबंधित कर्मचारियों के बयान से हो सकती है।
धर्मेंद्र गहलोत के आरोपों ने भी खड़े किए पुराने सवाल
पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत द्वारा निगम की कुछ फाइलों को लेकर पहले भी आरोप और जांच की मांग किए जाने की बात सामने आती रही है। वर्तमान घटनाक्रम के संदर्भ में इन पुराने आरोपों की भी चर्चा फिर तेज हुई है।
यदि गहलोत ने किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा राजनीतिक पदाधिकारी का नाम लेकर आरोप लगाए हैं तो प्रशासन के लिए उचित होगा कि व्यक्ति को दोषी मानने के बजाय रिकॉर्ड की जांच करे।
पुरानी शिकायतें क्या थीं? उन पर क्या कार्रवाई हुई? संबंधित फाइलें वर्तमान में कहां हैं? और क्या उन मामलों में कोई जांच लंबित है?
इन सवालों के जवाब मिलेंगे तो आरोप और तथ्य के बीच की दूरी भी साफ होगी।
दूसरा प्रकरण : किरण गढ़वाल की आपत्ति पर दिनभर चली कार्रवाई
17 सितंबर को भाजपा प्रत्याशी अनामिका शर्मा की ओर से कांग्रेस प्रत्याशी किरण गढ़वाल के नामांकन पर नगर निगम की कथित बकाया राशि को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस आपत्ति में करीब 19.18 लाख रुपये की राशि का मुद्दा उठाया गया। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद निर्वाचन अधिकारी ने भाजपा की आपत्ति खारिज कर दी और किरण गढ़वाल का नामांकन वैध माना।
कांग्रेस ने इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास बताया, जबकि भाजपा की ओर से आपत्ति को नियमों और कथित बकाया राशि से जुड़ा विषय बताया गया। दोनों पक्षों के दावों को उनके-अपने पक्ष के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार प्रशासनिक निर्णय में भाजपा की आपत्ति स्वीकार नहीं की गई।
यहीं से अजमेर की जनता का एक और सवाल सामने आता है—
जब नामांकन पर आपत्ति आई तो प्रशासन ने दिनभर सुनवाई कर दस्तावेजों की जांच की, तो नगर निगम की फाइलों से जुड़े आरोपों पर भी ऐसी ही स्पष्ट, पारदर्शी और निष्पक्ष जांच क्यों नहीं दिखाई देती?
यह कहना कि नामांकन पर आपत्ति सिर्फ फाइलों के मामले से ध्यान हटाने के लिए की गई थी, अभी एक राजनीतिक आरोप है; इसका कोई सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं है। इसलिए दोनों घटनाओं को जोड़कर निष्कर्ष निकालने के बजाय प्रशासन को दोनों की स्वतंत्र जांच करनी चाहिए।
अजमेर अब बयान नहीं, कार्रवाई का रिकॉर्ड चाहता है
भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई चुनाव तक सीमित रह सकती है, लेकिन नगर निगम की फाइलें अजमेर की सार्वजनिक संपत्ति और प्रशासनिक रिकॉर्ड हैं।
इसलिए जनता की मांग स्पष्ट है—
CCTV सुरक्षित हो।
फाइलों की सूची बने।
मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो।
पुराने आरोपों की स्थिति सामने आए।
चुनाव संबंधी शिकायतों की स्थिति सार्वजनिक हो।
और जहां जांच में प्रथमदृष्टया अनियमितता मिले, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
न किसी निर्दोष को राजनीतिक आरोप में फंसाया जाए, न किसी दोषी को राजनीतिक प्रभाव के कारण बचाया जाए।
अजमेर की जनता का सवाल
महापौर कौन बनेगा, यह निर्वाचित पार्षद तय करेंगे। लेकिन निगम की फाइलें कहां गईं, किस आदेश से गईं और 16 सितंबर की रात CCTV में क्या दर्ज हुआ—यह जानने का अधिकार अजमेर की जनता को है।
सवाल भाजपा बनाम कांग्रेस का नहीं।
सवाल अजमेर के सरकारी रिकॉर्ड का है।
सवाल आरोप लगाने का नहीं।
सवाल निष्पक्ष जांच कराने का है।
