अजमेर । अजमेर की धरती पर राष्ट्रवादी पार्टी (बीजेपी)के सनातनी प्रतिनिधियों ने बाजार में सड़क पर सुंदर झांकी सजाई जिससे जनता को लगे कि उनके जनप्रतिनिधि उन्हें नवसंवत्सर की बधाई दे रहे हैं । हालांकी स्थल पर चंद नेता ही दिखाई दिए । उसी बीच वहां बीजेपी का उल्टा झंडा लहराता हुआ कमरे में कैद हो गया ,जिसने अजमेर में बीजेपी के संगठन की पोल खोल कर रख दी,कार्यकर्ताओं का अभाव स्पष्ट दिखाई दिया , उन्हें नजरअंदाज करने का खमियाजा इन झंडों के उल्टा लटक कर लहराना इस बात की गवाही दे रहा है,जो कार्यकर्ता पसीने बहाकर झंडे लगाते थे दरी बिछाते थे उन्हें दरकिनार कर धनाढ्य लोगों(भू माफियाओं) के संगठन में प्रवेश ने आज तो झंडा उल्टा लगवा दिया आगे चलकर संगठन ने इन्हें टिकट नहीं दिया तो क्या संगठन को भी यह उल्टा लटका देंगे ? इससे संगठन को सबक लेना होगा और जिम्मेदार लोगों पर संगठन को कड़ी नजर रखनी होगी ।
अब सवाल ये नहीं कि झंडा उल्टा कैसे लग गया… सवाल ये है कि सोच कहीं सीधी रह गई है या वो भी उल्टी हो चुकी है?
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झंडा तो बस एक कपड़ा है, लेकिन उसका सीधा या उल्टा होना उस पार्टी के जिम्मेदारी की मानसिकता का आईना बन जाता है। जिस मंच पर प्रदेश उपाध्यक्ष से लेकर जिलाध्यक्ष तक मौजूद हों, जहां हर चेहरे को कैमरे में कैद होने की जल्दी हो… वहां अगर झंडा उल्टा रह जाए, तो ये सिर्फ “लापरवाही” नहीं, बल्कि संगठन से बड़ा उनका चेहरा प्राथमिकताओं का क्रम है।
कभी कार्यकर्ता पार्टी की रीढ़ हुआ करते थे…
आज वही कार्यकर्ता दरी बिछाने और झंडा लगाने तक सीमित कर दिए गए हैं।
और नेता?
नेता अब कैमरे के सामने “फ्रेम सेट” करने में व्यस्त हैं, संगठन सेट करने में नहीं।
कभी कहा जाता था—
“जहां कार्यकर्ता पसीना बहाता है, वहां पार्टी इतिहास बनाती है…”
लेकिन अब लगता है—
“जहां नेता कैमरा देखता है, वहीं राजनीति सजती है…”
अजमेर बीजेपी के हालात भी कुछ ऐसे ही दिखने लगे हैं। कार्यक्रम होते हैं, लेकिन भीड़ नहीं नवसंवत्सर हो या राजस्थान दिवस—जश्न से ज्यादा खाली कुर्सियां चर्चा में
ये वही शहर है जहां कभी नारे गूंजते थे, आज नेताओं की जनता के प्रति बेरुखी ने सन्नाटा कर दिया ।
क्या कार्यकर्ता नाराज़ है?
या फिर नेतृत्व से दूरी इतनी बढ़ गई है कि अब “समर्पण” की जगह “चापलूसी” ने ले ली है?
झंडा उल्टा लगना एक छोटी घटना हो सकती है,
लेकिन उसके पीछे छिपा संदेश बहुत बड़ा है—
“जब जड़ों को नजरअंदाज किया जाता है, तो शाखाएं खुद-ब-खुद उल्टी दिखने लगती हैं…”
राजनीति में दिखावा हमेशा सच्चाई पर भारी नहीं पड़ता।
नेताओं की मुस्कान कैमरे में कैद हो सकती है, लेकिन कार्यकर्ता का मन अगर टूट जाए,तो वो चुप्पी आने वाले चुनावों में सबसे जोरदार जवाब देती है।
आज अजमेर में उल्टा झंडा लहरा रहा है…
कल कहीं यही उल्टा रुख नतीजों में न दिख जाए…
क्योंकि जनता सब देख रही है,
और कार्यकर्ता सब समझ रहा है।
“झंडे को सीधा करना आसान है,
लेकिन व्यवस्था को सीधा करना मुश्किल…”
अब देखना ये है कि बीजेपी इसे एक मामूली भूल मानती है,
या फिर इसे आने वाले समय का संकेत समझकर खुद को संभालती है।
वीडियो देखें: सौ. J k shrama पेज

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