कलेक्टर साहब! बेटे को सांस लेने में तकलीफ थी… डॉक्टर ने दे दी मिर्गी की दवा, अब बच्चा उठ ही नहीं रहा

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महिला की शिकायत पर कलेक्ट्रेट में हड़कंप: निजी क्लीनिक में इलाज, जांच और फीस को लेकर गंभीर सवाल; कलेक्टर ने SGMH अधीक्षक को बच्चे का तत्काल इलाज कराने के दिए निर्देश

रीवा। बेटे की सांस फूल रही थी। मां इलाज की उम्मीद लेकर डॉक्टर के पास पहुंची। लेकिन कुछ समय बाद जब हाथ में दवाइयां आईं तो महिला के मुताबिक उसे बताया गया कि बच्चे को मिर्गी से जुड़ी दवा दी गई है। हालत यहां तक पहुंच गई कि महिला का दावा है—“अब मेरा बेटा उठ ही नहीं रहा।”बच्चे के इलाज को लेकर परेशान मां सोमवार को सीधे कलेक्ट्रेट पहुंची और कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के सामने पूरा मामला रखा। महिला की शिकायत सुनने के बाद कलेक्टर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संजय गांधी अस्पताल के अधीक्षक को बच्चे का तत्काल इलाज कराने के निर्देश दिए।मामला सामने आने के बाद निजी क्लीनिक में बच्चे के उपचार, जांच की सलाह, फीस और लिखी गई दवाओं को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि महिला के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और चिकित्सकीय निर्णय की वैधता का निर्धारण संबंधित जांच के बाद ही हो सकेगा।

सांस फूलने की शिकायत लेकर पहुंची थी महिला

महिला के अनुसार उसके बेटे का उपचार डॉ. वीरभान सिंह द्वारा संचालित बताए जा रहे सुंदी बाई न्यूरो क्लीनिक एवं मेडिसिन केयर सेंटर में कराया जा रहा था। बच्चे की मुख्य समस्या सांस फूलना बताई गई थी।महिला का कहना है कि डॉक्टर ने बच्चे की ईसीजी कराने की सलाह दी। आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसने आयुष्मान कार्ड के माध्यम से संजय गांधी अस्पताल में ईसीजी कराई और रिपोर्ट लेकर वापस डॉक्टर के पास पहुंची।यहीं से मामला विवाद में बदल गया।महिला का आरोप है कि संजय गांधी अस्पताल की रिपोर्ट देखने के बाद भी उससे दोबारा ईसीजी कराने के लिए कहा गया। महिला ने आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए दूसरी जांच कराने में असमर्थता जताई, लेकिन उसके मुताबिक जांच कराने पर जोर दिया गया।

“करीब 2500 रुपए खर्च हो गए”

शिकायत लेकर पहुंची महिला ने इलाज के दौरान हुए खर्च को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उसके अनुसार उससे अलग-अलग समय पर करीब 600-600 रुपए फीस ली गई, जबकि लगभग 1500 रुपए की दवाइयां भी लिखी गईं।महिला का कहना है कि सीमित आर्थिक स्थिति में उसने बच्चे के इलाज के लिए पैसे जुटाए, लेकिन बच्चे की हालत में सुधार होने के बजाय उसकी चिंता और बढ़ गई।

SGMH की ईसीजी सामान्य होने का महिला का दावा

महिला के मुताबिक संजय गांधी अस्पताल में कराई गई ईसीजी रिपोर्ट सामान्य आई थी। इसके बाद बच्चे की सांस फूलने की समस्या को देखते हुए आगे चिकित्सकीय उपचार की सलाह दी गई।महिला का आरोप है कि उसे वहां से यह भी जानकारी मिली कि बच्चे का मिर्गी संबंधी उपचार चल रहा है, जबकि वह अपने बेटे को सांस फूलने की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास गई थी।इसी विरोधाभास ने महिला की चिंता और बढ़ा दी। इसके बाद जब वह दोबारा संबंधित चिकित्सक के पास पहुंची तो उसके मुताबिक बच्चे की एमआरआई कराने की सलाह दी गई।महिला ने इसी पूरे उपचार क्रम पर सवाल उठाते हुए कलेक्ट्रेट में शिकायत दर्ज कराई।

कलेक्टर ने सुनवाई के बाद तत्काल लिया संज्ञान

महिला ने कलेक्टर को इलाज से संबंधित पूरी जानकारी दी और जांच तथा दवाओं को लेकर अपनी आपत्ति बताई। शिकायत सुनने के बाद कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने SGMH अधीक्षक को बच्चे का इलाज कराने के निर्देश दिए।अब इस मामले में यह महत्वपूर्ण होगा कि बच्चे की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति क्या है, पहले किए गए परीक्षणों की रिपोर्ट क्या कहती है और उसे दी गई दवाओं का चिकित्सकीय आधार क्या था।

क्लीनिक के कथित वीडियो ने बढ़ाया मामला

रीवा में बच्चे के इलाज की शिकायत लेकर कलेक्ट्रेट पहुंची महिला, कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने SGMH अधीक्षक को इलाज के निर्देश दिए
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महिला के पास डॉक्टर के क्लीनिक का बताया जा रहा एक वीडियो भी होने की बात सामने आई है। इसमें डॉक्टर को मीडिया को लेकर टिप्पणी करते हुए दिखाए जाने का दावा किया जा रहा है।वीडियो में कथित तौर पर यह कहते हुए सुनाई देने का दावा है—“मीडिया वाले आजकल कुछ ज्यादा ही उड़ रहे हैं।” हालांकि वीडियो किस परिस्थिति में बनाया गया, बातचीत किस संदर्भ में हुई, वीडियो की पूरी रिकॉर्डिंग क्या है और उसमें दिखाई दे रहे व्यक्ति के बयान का वास्तविक संदर्भ क्या है—इन सभी बिंदुओं की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

इलाज से ज्यादा अब जांच जरूरी

मामला केवल फीस या एक जांच कराने तक सीमित नहीं रह गया है। शिकायत में बच्चे की बीमारी, जांचों की आवश्यकता, दवाओं और उपचार प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं।ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि बच्चे की वर्तमान चिकित्सकीय स्थिति क्या है और उसे किस बीमारी के आधार पर कौन-सी दवा दी गई?कलेक्टर के निर्देश के बाद अब अस्पताल स्तर पर बच्चे की जांच और उपचार होने की उम्मीद है। आगे चिकित्सकीय परीक्षण और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि उपचार में कहीं लापरवाही हुई या पूरी प्रक्रिया चिकित्सकीय रूप से उचित थी।

अब निगाह जांच पर

की शिकायत ने स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े उस संवेदनशील सवाल को फिर सामने ला दिया है, जिसमें मरीज और उसके परिजन डॉक्टर की सलाह को ही अंतिम सत्य मानकर इलाज कराते हैं। ऐसे में जब किसी जांच, दवा या उपचार को लेकर सवाल उठता है तो रिकॉर्ड, मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञ जांच ही सबसे बड़ा आधार बनते हैं।फिलहाल कलेक्टर के निर्देश के बाद बच्चे के इलाज को प्राथमिकता दी गई है। आगे की जांच बताएगी कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और उपचार प्रक्रिया में वास्तव में क्या हुआ था।

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