एक-एक यूनिट की कीमत ₹4.80 लाख, दस्तावेज में ₹12 लाख भुगतान का उल्लेख; अब उठ रहे सवाल—कहां लगे कूलर और किस आधार पर तय हुई इतनी बड़ी लागत?
गंगेव/मनगवां।सरकारी धन से होने वाले खर्च की एक-एक पाई का हिसाब जनता जानना चाहती है। रीवा जिले के जनपद पंचायत गंगेव में पांच RO वाटर कूलर की स्थापना से जुड़ा एक दस्तावेज सामने आने के बाद अब इसी पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।22 सितंबर 2026 के कार्यालय आदेश में पांच नग RO वाटर कूलर स्थापित करने के लिए कुल ₹24 लाख की राशि दर्ज होने की बात सामने आई है। दस्तावेज में ₹12 लाख भुगतान का उल्लेख भी बताया गया है। उपलब्ध आंकड़ों को पांच इकाइयों में बांटें तो प्रत्येक RO वाटर कूलर की लागत करीब ₹4.80 लाख बैठती है।यहीं से कहानी में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—आखिर एक वाटर कूलर की कीमत इतनी क्यों?
पांच कूलर, ₹24 लाख… जनता पूछ रही है पूरा हिसाब
सरकारी रिकॉर्ड में जब पांच RO वाटर कूलर के लिए ₹24 लाख की राशि सामने आती है तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े होते हैं।पांचों RO वाटर कूलर कहां स्थापित किए जा रहे हैं?प्रत्येक यूनिट की क्षमता कितनी है?उपकरण की कीमत और स्थापना लागत का अलग-अलग विवरण क्या है?₹4.80 लाख प्रति यूनिट का तकनीकी आधार क्या है?इसका अनुमान किस अधिकारी अथवा तकनीकी एजेंसी ने तैयार किया?खरीद के लिए किस फर्म/एजेंसी का चयन हुआ?खरीद की प्रक्रिया क्या रही?क्या इसके लिए टेंडर या कोटेशन प्रक्रिया अपनाई गई?तकनीकी स्वीकृति और प्रशासनिक स्वीकृति किस स्तर से मिली?ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मामला सीधे सरकारी धन के उपयोग से जुड़ा है।
₹12 लाख भुगतान का उल्लेख, बाकी राशि का क्या?
दस्तावेज में ₹24 लाख की राशि के साथ ₹12 लाख के भुगतान का उल्लेख होने की बात सामने आई है। ऐसे में भुगतान की प्रकृति और चरण भी जांच का विषय बनते हैं।क्या ₹12 लाख अग्रिम भुगतान है?क्या यह आंशिक भुगतान है?किसके खाते में राशि गई?किस बिल के आधार पर भुगतान हुआ?और शेष ₹12 लाख के भुगतान की स्थिति क्या है?इन सवालों का स्पष्ट जवाब बिल, वाउचर, भुगतान आदेश और संबंधित वित्तीय अभिलेख ही दे सकते हैं।
कूलर कहां हैं? यही सबसे बड़ा सवाल
सरकारी राशि खर्च होने के बाद जनता का यह जानना जरूरी है कि जिन पांच RO वाटर कूलर के लिए इतनी बड़ी रकम स्वीकृत या दर्ज की गई, वे जमीन पर कहां दिखाई दे रहे हैं। यदि इकाइयां स्थापित हो चुकी हैं तो उनके स्थान, क्षमता, मॉडल, खरीद मूल्य और स्थापना की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि काम अभी अधूरा है तो उसकी वर्तमान स्थिति भी सामने आनी चाहिए।क्योंकि सरकारी फाइल में दर्ज रकम का वास्तविक मूल्य तभी साबित होता है, जब उसका लाभ जमीन पर जनता को दिखाई दे।
टेंडर से लेकर बिल तक सामने आए पूरी फाइल
इस पूरे मामले में किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना उद्देश्य नहीं है। असली सवाल प्रक्रिया और पारदर्शिता का है।जनपद पंचायत से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों को यदि पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिया जाए तो तस्वीर खुद साफ हो सकती है। इसके लिए टेंडर दस्तावेज, तकनीकी स्वीकृति, लागत अनुमान, वर्क ऑर्डर, सप्लाई बिल, स्थापना प्रमाण-पत्र और भुगतान से जुड़े अभिलेख सामने आना जरूरी है।दस्तावेज सामने होंगे तो सवालों के जवाब भी सामने होंगे।
₹24 लाख में कितनी प्यास बुझेगी?
गंगेव क्षेत्र में ग्रामीण इलाकों में पेयजल सुविधाएं अपने आप में बड़ा जनसरोकार हैं। ऐसे में सवाल केवल पांच मशीनों का नहीं है, बल्कि यह भी है कि ₹24 लाख के इस खर्च से कितने लोगों को पेयजल सुविधा मिलेगी।क्या पांच स्थानों पर RO वाटर कूलर लगाकर यह राशि पूरी तरह उपयोगी साबित होगी?क्या इन्हें ऐसे स्थानों पर लगाया जा रहा है जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में ग्रामीणों की आवाजाही होती है?इनकी देखरेख कौन करेगा?फिल्टर और मेंटेनेंस का खर्च कौन उठाएगा?और सबसे अहम—कुछ साल बाद इनके संचालन की जिम्मेदारी किसकी होगी?इन सवालों का जवाब परियोजना की वास्तविक उपयोगिता भी सामने लाएगा।
अब निगाह जनपद CEO के जवाब पर
मामला दस्तावेज में दर्ज राशि से जुड़ा है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और मूल अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही निकलेगा। फिलहाल उपलब्ध दस्तावेज में दर्ज ₹24 लाख की राशि और ₹12 लाख भुगतान के उल्लेख ने पारदर्शिता को लेकर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।अब देखना यह है कि जनपद पंचायत गंगेव की मुख्य कार्यपालन अधिकारी इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ देती हैं या नहीं।क्योंकि सवाल किसी एक कूलर का नहीं है—सवाल उन ₹24 लाख का है, जिनका हिसाब जनता के सामने होना चाहिए। सरकारी पैसा जनता का है, इसलिए उसके खर्च का हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए
