देवकांत मीणा प्रकरण में राज्य की याचिका खारिज; नई सामग्री के बिना पुराने निर्णय की समीक्षा पर उठाए सवाल, ‘Political Dictate’ का भी उल्लेख
नई दिल्ली/जयपुर। राजस्थान सरकार को देवकांत मीणा से जुड़े अभियोजन मंजूरी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की SLP (Criminal) No. 2951/2026 खारिज करते हुए अभियोजन की मंजूरी दोबारा दिए जाने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। यह मामला अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के तत्कालीन ऑर्थोपेडिक्स प्रोफेसर एवं यूनिट हेड डॉ. देवकांत मीणा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ—न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन—ने 23 जुलाई 2026 को मामले में फैसला सुनाया।
पहले मंजूरी से किया था इनकार
मामले के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने मार्च 2018 में डॉ. मीणा के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। उस समय उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद संबंधित प्राधिकारी ने अभियोजन आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना था।
मामले की पृष्ठभूमि में आरोप था कि घुटने की सर्जरी के लिए मरीज के परिजन से रिश्वत की मांग की गई। एसीबी की कार्रवाई में ₹2,000 की राशि बरामद होने का आरोप भी रिकॉर्ड में दर्ज था।
इसके बाद मामले को दोबारा विचार के लिए खोला गया और अभियोजन की मंजूरी दे दी गई। इसी पुनर्विचार के आधार पर जारी sanction order को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
नई सामग्री के बिना फैसला बदलने पर आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए अभियोजन मंजूरी की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया। अदालत ने कहा कि यदि सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध सामग्री पर विचार कर एक बार अभियोजन की मंजूरी से इनकार कर चुका है, तो नई सामग्री के अभाव में केवल राय बदलने के आधार पर उसी निर्णय की समीक्षा करना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न अभियोजन मंजूरी की प्रक्रिया और उसके पुनर्विचार की वैधानिकता से जुड़ा था।
फैसले में ‘Political Dictate’ का उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में रिकॉर्ड की परिस्थितियों के संदर्भ में “Political Dictate” का उल्लेख किया गया। अदालत ने मामले को दोबारा खोले जाने की प्रक्रिया और मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका से संबंधित पहलुओं पर भी टिप्पणी की।
अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि अभियोजन मंजूरी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय स्वतंत्र विवेक, उपलब्ध सामग्री और कानून के अनुरूप लिए जाने चाहिए। निर्णय प्रक्रिया पर किसी बाहरी या राजनीतिक प्रभाव की स्थिति उसकी निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।
₹1 लाख का जुर्माना
मामले में ₹1 लाख की राशि को लेकर भी स्थिति स्पष्ट है। आदेश के अनुसार ₹50,000 हाईकोर्ट में और ₹50,000 सुप्रीम कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार कुल ₹1 लाख की लागत निर्धारित हुई।
आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं
यह भी महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय डॉ. देवकांत मीणा के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों पर दोषसिद्धि अथवा निर्दोषता का अंतिम निर्णय नहीं है। मामले में शीर्ष अदालत के समक्ष प्रमुख विवाद अभियोजन की मंजूरी दोबारा दिए जाने की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर था।
सरकारी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण नजीर
देवकांत मीणा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अभियोजन मंजूरी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। फैसला यह संकेत देता है कि प्रशासनिक प्राधिकारी को अभियोजन मंजूरी के संबंध में निर्णय लेते समय उपलब्ध सामग्री और कानूनी प्रक्रिया का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करना होगा।
अजमेर के जेएलएन अस्पताल से जुड़े इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक अहम सवाल को रेखांकित किया है—एक बार अभियोजन मंजूरी से इनकार के बाद यदि कोई नई सामग्री सामने नहीं आती, तो केवल मत परिवर्तन के आधार पर पुराने निर्णय को बदलने की प्रक्रिया कितनी वैध है। इसी प्रश्न पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी भविष्य के समान मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
