पर्यावरणविद् बाबूलाल साहू ने सौंपा विस्तृत ज्ञापन, प्रशासनिक निष्क्रियता पर उठाए सवाल; कार्रवाई नहीं हुई तो अगले माह नक्शे और मौका रिपोर्ट के साथ दिल्ली पहुंचने की चेतावनी
अजमेर। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर अजमेर में एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। शहर और आसपास के इलाकों में पहाड़ियों को काटकर कथित रूप से किए जा रहे अवैध निर्माण, खनन और कमर्शियल प्लाटिंग के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता बाबूलाल साहू ने अरावली संरक्षण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति के समक्ष विस्तृत प्रतिवेदन एवं ज्ञापन प्रस्तुत कर पूरे मामले में हस्तक्षेप और प्रभावी कार्रवाई की मांग की है।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि अजमेर के आसपास अरावली की पहाड़ियों और प्राकृतिक भू-आकृतियों को काटकर जमीन को समतल किया जा रहा है। इसके बाद कथित तौर पर वहां निर्माण और प्लाटिंग की गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह पहाड़ियों के प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़छाड़ न केवल अरावली के अस्तित्व के लिए खतरा है, बल्कि क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन, जल संरक्षण और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल सकती है।
‘शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?’
बाबूलाल साहू ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जिला प्रशासन, नगर निगम, खनिज विभाग, वन विभाग और राजस्व विभाग को लगातार शिकायतें एवं साक्ष्य उपलब्ध कराए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होना चिंताजनक है।
उन्होंने अधिकारियों और भू-माफिया, खान-माफिया अथवा बिल्डरों के बीच कथित मिलीभगत का आरोप लगाया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि अरावली क्षेत्र में नियमों का उल्लंघन कर निर्माण, खनन अथवा प्लाटिंग हो रही है तो संबंधित विभागों को मौके पर जाकर सीमांकन, रिकॉर्ड की जांच और वैधानिक कार्रवाई करनी चाहिए।
पुष्कर घाटी की अरावली पर भी नजर जरूरी
अरावली संरक्षण की चर्चा अजमेर तक सीमित नहीं रह सकती। पुष्कर घाटी स्थित अरावली पर्वत श्रृंखला पर कथित अतिक्रमणों और कब्जों को खाली करवाना भी इस अभियान का अहम हिस्सा होना चाहिए।
पुष्कर घाटी क्षेत्र में पहाड़ियों, प्राकृतिक ढलानों और आसपास की भूमि पर हुए कथित अतिक्रमणों की प्रशासनिक स्तर पर पहचान कर राजस्व रिकॉर्ड, वन सीमा, मास्टर प्लान और वास्तविक मौके की स्थिति का मिलान किया जाना जरूरी है। जहां अतिक्रमण अथवा अवैध कब्जा प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई करते हुए अरावली की मूल स्थिति बहाल करने की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए।
पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल नई अवैध प्लाटिंग रोकना पर्याप्त नहीं होगा। पहले से हुए कथित अतिक्रमण और कब्जों की भी निष्पक्ष जांच तथा वैधानिक कार्रवाई आवश्यक है।
अगले माह दिल्ली पहुंचने की चेतावनी
बाबूलाल साहू ने कहा है कि यदि स्थानीय स्तर पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती है तो वे अगले माह नई दिल्ली जाकर संबंधित सुप्रीम कोर्ट जांच समिति के समक्ष व्यक्तिगत रूप से अपना पक्ष रखेंगे।
उनका कहना है कि वे जिले का विस्तृत नक्शा, संबंधित दस्तावेज, शिकायतों का रिकॉर्ड और मौके की स्थिति से संबंधित रिपोर्ट/साक्ष्य समिति के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। उनका उद्देश्य अरावली क्षेत्र में कथित अवैध गतिविधियों और प्रशासनिक स्तर पर हुई कार्रवाई की वास्तविक स्थिति को सामने रखना है।
अब सवाल कार्रवाई का है
अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान की प्राकृतिक पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में अजमेर में पहाड़ियों की कटाई, अवैध निर्माण, खनन और प्लाटिंग से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
अब निगाह जिला प्रशासन और संबंधित विभागों पर है कि वे शिकायतों और प्रस्तुत साक्ष्यों का संज्ञान लेकर मौका निरीक्षण, सीमांकन और रिकॉर्ड की जांच करते हैं या नहीं। खास तौर पर पुष्कर घाटी की अरावली में कथित अतिक्रमण और कब्जों की स्थिति स्पष्ट करना भी प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा होगी।
अरावली बचाने की लड़ाई अब सिर्फ पहाड़ बचाने की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन, पानी और पर्यावरण बचाने की लड़ाई बन चुकी है।
