कांग्रेस का बंद, भाजपा का सफाई अभियान और झील का सवाल—आखिर कब तक चलेगा यह राजनीतिक तमाशा?
अजमेर की आनासागर आज सिर्फ एक झील नहीं, बल्कि दशकों की राजनीति, प्रशासनिक लापरवाही और जनप्रतिनिधियों के वादों की खामोश गवाह है। जिस आनासागर को बचाने के लिए आज कांग्रेस बंद का आह्वान कर रही है और भाजपा सफाई अभियान की बात कर रही है, वही आनासागर वर्षों से अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। सवाल यह नहीं कि आज कौन इसके साथ खड़ा है, सवाल यह है कि जब झील धीरे-धीरे मर रही थी, तब जिम्मेदार कहां थे?
आज मछलियां मरती हैं तो राजनीति जाग जाती है। गंदगी दिखाई देती है तो अभियान शुरू हो जाता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, बयान जारी होते हैं, आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं और फिर कुछ दिनों बाद सब अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। आनासागर फिर उसी हालत में छोड़ दी जाती है।
एक तरफ जिम्मेदारों की चमकदार जिंदगी है—एसी कमरों में बैठकें, सरकारी गाड़ियां, चमकते कार्यालय और विकास की रंगीन तस्वीरें। दूसरी तरफ वही आनासागर है, जिसकी बिगड़ती सूरत अजमेर की व्यवस्था का आईना बन चुकी है। जिम्मेदारों के चेहरों की चमक बढ़ती गई और आनासागर की चमक फीकी पड़ती गई।
करोड़ों रुपये खर्च हुए, योजनाएं बनीं, सफाई हुई, मिट्टी निकाली गई, सौंदर्यीकरण हुआ—फिर भी समस्या जस की तस क्यों है? नालों का गंदा पानी रोकने की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं हुई? हर बार सफाई के बाद वही गंदगी लौट आती है तो जवाबदेही किसकी है?
अब जनता को भी नारों से आगे बढ़ना होगा। आनासागर को बंद नहीं, स्थायी समाधान चाहिए। सफाई अभियान नहीं, निरंतर निगरानी चाहिए। राजनीति नहीं, जवाबदेही चाहिए।
क्योंकि आनासागर अब शायद पूछ रही है—
“मुझे बचाने आज आए हो… लेकिन जब मैं वर्षों से मर रही थी, तब तुम कहां थे?”
और यह सवाल सिर्फ नेताओं से नहीं, पूरे अजमेर से है।
