नई दिल्ली। पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (एसपीई) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से बाहर रखने वाली राज्य सरकार की वर्ष 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली एसपीई को “खुफिया एवं सुरक्षा संगठन” नहीं माना जा सकता, इसलिए उसे RTI कानून से पूर्ण छूट नहीं दी जा सकती।
जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत केवल खुफिया एवं सुरक्षा संगठनों को ही छूट दी जा सकती है। एसपीई का कार्य भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामलों की जांच तक सीमित है और इसका कोई खुफिया या सुरक्षा संबंधी दायित्व नहीं है। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा दी गई छूट कानून की सीमाओं से परे और अतिरेकपूर्ण है।
यह मामला कटनी के तत्कालीन टाउन इंस्पेक्टर कमता प्रसाद मिश्रा से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2017 में एसपीई द्वारा दर्ज एक ट्रैप मामले में आरोपी बनाया गया था। अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद मिश्रा ने वर्ष 2020 में उससे संबंधित निर्णय प्रक्रिया और पत्राचार की जानकारी RTI के माध्यम से मांगी थी। संबंधित अधिकारियों और राज्य सूचना आयोग ने धारा 8(1)(h) का हवाला देकर सूचना देने से इनकार कर दिया था।
बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र भी दाखिल किया जा चुका है, इसलिए सूचना उपलब्ध कराने में कोई बाधा नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश को एसपीई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने उसकी अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (SBIEO) के संबंध में 2011 की अधिसूचना की वैधता पर उसने कोई टिप्पणी नहीं की है। इस फैसले को भ्रष्टाचार जांच एजेंसियों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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