सत्ता के सामने,झुकती व्यवस्था..
अजमेर में जो हुआ, वह कोई “सामान्य बहस” नहीं। यह उस सिस्टम की लाइव स्क्रीनिंग थी, जहां कानून की किताबें आम आदमी के लिए खुलती हैं और सत्ता के सामने खुद ही बंद हो जाती हैं।
वीडियो में बीजेपी के पार्षद एवं नगर निगम के पूर्व उपमहापौर नीरज जैन जिस अंदाज़ में पुलिसकर्मियों को खरी-खोटी सुनाते नजर आए, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। सवाल सिर्फ शब्दों का नहीं है… सवाल उस व्यवस्था का है, जहां थाने में आम आदमी ऊंची आवाज में अपने हक की बात कर दे तो उस पर “राजकार्य में बाधा”, “शांति भंग”, “कानून व्यवस्था बिगाड़ने” जैसी धाराएं बरस पड़ती हैं। लेकिन नेताजी अगर वर्दी को सार्वजनिक मंच पर झाड़ दें, तो सिस्टम अचानक मौन व्रत धारण कर लेता है।
देश का दुर्भाग्य देखिए… सीमा पर जवान धूप में तपता है और शहरों में सिपाही राजनीतिक ताप में। नीचे खड़ा पुलिसकर्मी रोज जनता का गुस्सा झेलता है, ट्रैफिक में जलता है, अपराधियों से भिड़ता है, लेकिन जैसे ही सामने “पावर” आ जाए, उसकी वर्दी का स्टार भी राजनीतिक प्रोटोकॉल में गिरवी रख दिया जाता है।
यह वही देश है जहां गरीब आदमी थाने में कुर्सी पर बैठ जाए तो “औकात” याद दिला दी जाती है, लेकिन सत्ता के गलियारों से निकले लोग कानून को ही खड़ा कर “लाइन हाज़िर” कर देते हैं।
अजमेर की यह घटना बताती है कि सिस्टम अब फाइलों से नहीं, फोन कॉलों से चलता है। कानून अब धाराओं से नहीं, पहचान से तय होता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि पुलिस विभाग के ईमानदार अधिकारी भी कई बार अपने ही सिस्टम में “शांत रहो” का आदेश सुनते रह जाते हैं। परिजन और समाज के सामने गर्दन नीची कर स्वयं को दोषी साबित हो जाते हैं।
अब पुलिस विभाग को भी यह सार्वजनिक अपमान और एक सिपाही की टूटी हुई गरिमा याद रखनी होगी। क्योंकि जब वर्दी बार-बार सत्ता के सामने झुकेगी, तब कानून पर जनता का भरोसा भी झुकने लगेगा। सम्मान अगर केवल पद और पहुंच वालों के लिए बचा रहेगा, तो मैदान में खड़ा सिपाही भीतर से टूट जाएगा।
सिस्टम को यह समझना होगा कि सिपाही सिर्फ कर्मचारी नहीं, कानून का चेहरा होता है। जिस दिन उसी चेहरे की सार्वजनिक बदनामी सामान्य बना दी जाएगी, उस दिन व्यवस्था की रीढ़ कमजोर पड़ जाएगी। और अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो आने वाले समय में सिस्टम केवल दबाव में काम करेगा — न्याय में नहीं।
जनता सब देख रही है। जनता समझ रही है कि लोकतंत्र की कुर्सी पर आखिर बैठा कौन है — संविधान या सत्ता का प्रभाव?
क्योंकि अगर वर्दी सिर्फ आम आदमी पर ही भारी पड़े और सत्ता के दबाव/ सामने में उतारी जाए, तो फिर सवाल पुलिस पर नहीं… पूरे सिस्टम पर उठेंगे।
वीडियो सौजन्य से: the fact Ajmer
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जय जवान,जय किसान ,जय हिंद


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