“ऑन व्हील्स सरकार, ऑफ ट्रैक प्रशासन—जमीन पर मरता सिस्टम, सड़कों पर भटकती जनता!”

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‼️“दौरे, दिखावा और मौतों पर मौन”—सरकार का नया मॉडल?‼️ सुरेंद्र चतुर्वेदी

राजस्थान की सियासत इन दिनों अजीब मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ सरकार “ऑन व्हील्स” मॉडल को उपलब्धि की तरह पेश कर रही है, तो दूसरी तरफ ज़मीनी सच्चाई यह है कि सिस्टम खुद व्हीलचेयर पर बैठा नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री से लेकर अफसर तक—सब सड़क पर हैं… लेकिन सवाल यह है कि सिस्टम आखिर है कहाँ?

सुरेंद्र चतुर्वेदी ने अपने ब्लॉग में जिस “दौरा संस्कृति” पर तंज कसा है, वह केवल प्रशासनिक मज़ाक नहीं, बल्कि एक खतरनाक संकेत है। जब शासन फाइलों से ज्यादा फोटो में और फैसलों से ज्यादा फ्लाइट में दिखने लगे, तो समझ लीजिए कि प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।

सरकार कहती है—अफसर जिलों में जाएंगे, ज़मीनी हकीकत समझेंगे। लेकिन हकीकत समझने के लिए क्या हर महीने 10 दिन का “सरकारी पर्यटन” जरूरी है? या फिर यह जनता को दिखाने का नया तरीका है कि “देखो, हम चल रहे हैं… भले ही काम रुका हुआ हो”?

और इसी बीच सबसे बड़ा और कड़वा सवाल—
क्या इन दौरों से किसी बच्चे की जान बची?

पुष्कर में सीवर लाइन साफ करते समय हुई मौत… क्या वह सिर्फ एक खबर थी?
क्या किसी जिम्मेदार पर ठोस कार्रवाई हुई?
या फिर फाइलों में “जांच जारी है” लिखकर मामला दफना दिया गया?

सच यह है कि हमारे बच्चों की मौत अब सिस्टम के लिए संवेदना नहीं, सांख्यिकी (statistics) बन गई है।
चाहे बच्चा किसी भी समाज का हो—दर्द एक जैसा है, लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया हमेशा “औपचारिक” ही रहती है।

नगर निगम और प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने की बजाय, पूरा ध्यान “दौरे सफल रहे” की रिपोर्ट बनाने में है।
जमीनी हकीकत यह है कि—

  • सीवर आज भी बिना सुरक्षा के साफ हो रहे हैं
  • मजदूर आज भी बिना उपकरण मौत के मुंह में धकेले जा रहे हैं
  • और अफसर… वे “निरीक्षण” के नाम पर अगले जिले के लिए रवाना हो चुके हैं

यह कैसा प्रशासन है जहाँ
मौत स्थायी है और जिम्मेदारी अस्थायी?

सरकार को यह समझना होगा कि
शासन “मूवमेंट” से नहीं, “मैनेजमेंट” से चलता है।
दौरे करने से ज्यादा जरूरी है—
जिम्मेदारी तय करना, कार्रवाई करना और सिस्टम को जवाबदेह बनाना।

वरना आने वाले समय में इतिहास यही लिखेगा—
सरकार चलती बहुत थी… लेकिन चलाती कुछ नहीं थी।

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