जयपुर । (मीडिया) राजस्थान विधानसभा में हाल ही में एक गंभीर सामाजिक और पारिवारिक मुद्दे पर चर्चा देखने को मिली, जब भीलवाड़ा से निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी ने सदन में संपत्ति अधिकारों से जुड़े मामलों में उत्पन्न हो रहे विवादों पर अपनी भावना रखी। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में बेटियां न्यायालय में अपने माता-पिता को पहचानने से इनकार कर अन्य व्यक्तियों के साथ रहने की सहमति देती हैं और इसके आधार पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत संपत्ति अधिकारों का दावा करती हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है।
विधायक अशोक कोठारी ने यह विषय राजस्थान विधानसभा में विशेष उल्लेख के माध्यम से उठाते हुए कहा कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों का कुछ मामलों में कथित रूप से दुरुपयोग हो रहा है। उनका तर्क था कि ऐसे मामलों में माता-पिता को सामाजिक, मानसिक और आर्थिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है, जबकि लंबी न्यायिक प्रक्रियाएं परिवारों को और अधिक तोड़ देती हैं।
कानूनी दृष्टि से देखें तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत पुत्री को पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध समान अधिकार प्राप्त हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय स्पष्ट करते हैं कि यह अधिकार पुत्री की वैवाहिक स्थिति या माता-पिता से संबंधों पर निर्भर नहीं करता। यह कानून लैंगिक समानता को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है और इसे किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं किया जा सकता।
हालांकि विधायक ने यह भी सुझाव दिया कि राजस्थान काश्तकारी अधिनियम एवं राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम में आवश्यक संशोधन या स्पष्ट प्रावधान किए जाएं, ताकि कृषि भूमि और संपत्ति से जुड़े मामलों में पारिवारिक सहमति, उत्तराधिकार और कब्जे की स्थिति को अधिक स्पष्ट किया जा सके। उनका मानना था कि इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी में कमी आएगी और परिवारों को न्यायालयों के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी।
सदन में यह भी कहा गया कि यदि कानूनों में स्पष्टता लाई जाती है तो लव जिहाद अथवा संपत्ति के लालच में मासूम बच्चियों को फंसाए जाने जैसी घटनाओं पर भी प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा। हालांकि विधि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में आपराधिक कानून और उत्तराधिकार कानून को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, ताकि किसी भी वर्ग के संवैधानिक अधिकारों का हनन न हो।
जनहित की कसौटी पर देखें तो सरकार द्वारा इस विषय पर विचार करना सामाजिक वास्तविकताओं को समझने की दिशा में एक कदम है, लेकिन किसी भी संशोधन से पूर्व यह आवश्यक होगा कि प्रस्तावित बदलाव संविधान, न्यायालयों के निर्णयों और महिला अधिकारों के अनुरूप हों। स्पष्ट कानून विवाद कम कर सकते हैं, परंतु संतुलन बनाए रखना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।
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