प्रयागराज । (मीडिया) माघ मेला-2026 के दौरान मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर शंकराचार्य के साथ दुर्व्यवहार को लेकर विवाद खड़ा हो गया । इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था की संत-समाज के प्रति रवैये पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके अनुयायियों के साथ पुलिस-प्रशासन की टकराव की घटना ने न केवल संत समाज को आहत किया है । घटना 18 जनवरी 2026 को सुबह लगभग 9 बजे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों के साथ संगम तट पर पवित्र स्नान के लिए आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान मेला क्षेत्र में तैनात पुलिस और प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन का हवाला देते हुए उनकी पालकी/रथ को आगे बढ़ने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि अत्यधिक भीड़ के कारण वाहनों और पालकी को अनुमति नहीं दी जा सकती और संतों को पैदल जाने के लिए कहा गया था। जिसके बाद विवाद बढ़ गया।
प्रत्यक्षदर्शियों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अनुयायियों और पुलिस के बीच तीखी बहस हुई, जो आगे चलकर धक्का-मुक्की और हाथापाई तक पहुंच गई। आरोप है कि इस दौरान कुछ अनुयायियों को हिरासत में लिया गया और उनके साथ अभद्र व्यवहार हुआ। हालांकि प्रशासन ने मारपीट के आरोपों से इनकार करते हुए इसे नियमों के पालन की कार्रवाई बताया।
घटना से आहत शंकराचार्य ने पवित्र स्नान से इनकार कर दिया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक उन्हें सम्मानपूर्वक संगम तक नहीं ले जाया जाएगा, तब तक वे स्नान नहीं करेंगे। इसके बाद वे अपने शिविर लौट गए और धरने पर बैठने की घोषणा की। शंकराचार्य का यह कदम संत समाज में व्याप्त असंतोष और पीड़ा का प्रतीक माना जा रहा है।
यह घटना केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक प्रश्न है।
संत-महात्मा भारतीय समाज की आत्मा और परंपरा के वाहक माने जाते हैं। माघ मेला जैसे धार्मिक आयोजन में यदि उनके साथ ऐसा व्यवहार होता है, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन क्या इसके लिए संवाद और सम्मान का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता था?
जनता के लिए यह आत्ममंथन का विषय है।
लोकतंत्र में प्रशासन जनता और समाज के सभी वर्गों के लिए होता है, न कि केवल नियमों की कठोर पालना के लिए। संत समाज के प्रति सम्मान और संवाद बनाए रखना उतना ही आवश्यक है जितना कानून-व्यवस्था। यह घटना चेतावनी है कि यदि आस्था और प्रशासन के बीच संतुलन नहीं साधा गया, तो सामाजिक विश्वास कमजोर होगा।
अब आवश्यकता है निष्पक्ष जांच और संवेदनशील नीति की, ताकि भविष्य में धार्मिक आयोजनों में ऐसी स्थितियां दोबारा न उत्पन्न हों और देश की आध्यात्मिक परंपराओं की गरिमा बनी रहे।
