रीवा/भोपाल
राष्ट्रीय स्तर पर हुई आर टी आई 291 मीट में भारत की न्यायिक व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा हुई जहां प्रवक्ताओं ने वर्तमान हालत और सुधारों पर चर्चा की गई ।
मीटिंग के होस्ट शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि वर्तमान में न्यायिक व्यवस्था में सुधार को अब ज्यादा टाला नहीं जा सकता । न्यायपालिका आज एक गंभीर चुनौती के दौर से गुजर रही है। देशभर में पाँच करोड़ से अधिक मामले विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं, जिससे “समय पर न्याय” का संवैधानिक अधिकार आम नागरिक के लिए अर्थहीन होता जा रहा है।
इसी पृष्ठभूमि के क्रम में आयोजित 291वीं RTI मीट में राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति (National Litigation Policy – NLP) और लंबित मामलों की भयावह स्थिति पर गंभीर मंथन किया गया।
बैठक में बताया गया कि राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति वर्ष 2010 में इस उद्देश्य से लाई गई थी कि सरकार एक जिम्मेदार वादी के रूप में व्यवहार करेगी और अनावश्यक मुकदमों में कमी आएगी । दुर्भाग्यवश, नीति के क्रियान्वयन में नौकरशाही की उदासीनता और राजनीतिक इच्छाशक्ति शक्ति की कमी के चलते यह धराशाही हो गई । परिणामस्वरूप सरकार स्वयं सबसे बड़ी वादी बन गई और अदालतों पर बोझ लगातार बढ़ता चला गया।
चर्चा के दौरान सामने आया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने मुकदमेबाजी पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च कर दिए, जिनका उपयोग न्यायिक बुनियादी ढांचे, अदालतों और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने में किया जा सकता था। यह स्थिति न्याय प्रणाली की संरचनात्मक विफलता को उजागर करती है।
बैठक में समाधान के तौर पर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए। इनमें राष्ट्रीय वादी सभा का गठन, कानूनों का सरलीकरण, अपील के अनावश्यक स्तरों में कटौती और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र—जैसे मध्यस्थता, सुलह और लोक अदालतों—के व्यापक उपयोग पर जोर दिया गया। साथ ही सभी राज्यों में लंबित मामलों का समेकित डेटा एकत्र कर नीति निर्माण को साक्ष्य-आधारित बनाने की आवश्यकता बताई गई।
न्यायिक सुधारों में प्रौद्योगिकी की भूमिका को भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया। ई-कोर्ट्स, वर्चुअल सुनवाई, केस मैनेजमेंट सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कानूनी शोध उपकरणों के उपयोग से न्याय प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि तकनीक मानव विवेक का विकल्प नहीं, बल्कि न्याय को सुगम बनाने का माध्यम है।
बैठक में राजनीति के अपराधीकरण और गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों पर भी चिंता व्यक्त की गई। इस विषय पर मीटिंग के माध्यम से संयुक्त संसदीय समिति को ठोस आंकड़ों के साथ जवाबदेही तय करने की मांग की गई ।
291वीं RTI मीट का संदेश स्पष्ट है—यदि राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति को ईमानदारी से लागू नहीं किया गया और न्यायिक ढांचे में व्यापक सुधार नहीं हुए, तो लंबित मामलों का बोझ लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता रहेगा। अब न्याय सुधार एक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।
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