अजमेर दरगाह में प्रधानमंत्री की चादर पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
नई दिल्ली | 5 जनवरी
सुप्रीम कोर्ट ने अजमेर दरगाह शरीफ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चादर चढ़ाने से रोकने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप योग्य नहीं है और अदालत इस प्रकार के विषयों में दखल नहीं दे सकती।
यह याचिका एक सामाजिक संगठन से जुड़े व्यक्तियों द्वारा दायर की गई थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि प्रधानमंत्री सहित संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किसी धार्मिक स्थल पर औपचारिक रूप से चादर चढ़ाना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विरुद्ध है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि इसे “राज्य प्रायोजित धार्मिक गतिविधि” माना जाना चाहिए और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने की। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह विषय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि जिस चादर को लेकर विवाद उठाया गया, वह पहले ही परंपरा के अनुसार चढ़ाई जा चुकी है, ऐसे में याचिका अब “निरर्थक” (infructuous) हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का अजमेर दरगाह से जुड़े किसी अन्य लंबित दीवानी मुकदमे या ऐतिहासिक विवादों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक परंपराओं और सांकेतिक औपचारिकताओं को रोकने या अनुमति देने का निर्णय न्यायपालिका का नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र का विषय है।
उल्लेखनीय है कि अजमेर दरगाह शरीफ में प्रधानमंत्री द्वारा चादर भेजने या चढ़ाने की परंपरा आज़ादी के बाद से चली आ रही है और पूर्व प्रधानमंत्रियों द्वारा भी इसका पालन किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह स्थिति स्पष्ट हो गई है कि प्रधानमंत्री या किसी संवैधानिक पदाधिकारी के ऐसे प्रतीकात्मक धार्मिक आचरण पर न्यायिक रोक नहीं लगाई जा सकती।
