पटना: आज 05 जनवरी 2026 को सिख धर्म के दसवें और अंतिम मानव गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती पूरे देश, विशेषकर पंजाब में, श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। यह दिन सिख धर्म में प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसका अर्थ है—मन से बुराइयों को दूर कर सत्य, ईमानदारी और सेवा भाव से जीवन को प्रकाशित करना।
श्री गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब, बिहार में हुआ था। उनका मूल नाम गोबिंद राय था। वे नौवें सिख गुरु गुरु तेग बहादुर जी के पुत्र थे। पिता के बलिदान के बाद वे मात्र 10 वर्ष की आयु में सिखों के गुरु बने। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही नेतृत्व, साहस और धर्मरक्षा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
गुरु गोविंद सिंह जी का सबसे महान योगदान 1699 ई. में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना है। खालसा पंथ के माध्यम से उन्होंने सिखों को अन्याय, अत्याचार और उत्पीड़न के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति दी। वे ‘संत-सिपाही’ के आदर्श के प्रतीक थे, जिनमें भक्ति और वीरता का अनूठा समन्वय दिखाई देता है।
वे महान कवि और विद्वान भी थे। उन्होंने कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया और ‘दसम ग्रंथ’ की रचना की। धर्म और न्याय की रक्षा के लिए उन्होंने मुगल अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष किया और अपने चारों पुत्रों (साहिबजादों) सहित पूरा परिवार राष्ट्र और धर्म के लिए बलिदान कर दिया। इसी कारण उन्हें ‘सरबंसदानी’ कहा जाता है।
1708 ई. में नांदेड़ (महाराष्ट्र) में उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया। उनका जीवन आज भी मानवता को सत्य, समानता, साहस और भाईचारे का संदेश देता है।
